Hanuman Ansh ने बदला बॉलीवुड का रुख, करण जौहर भी ला रहे कृष्ण की कहानी; क्या Gen-Z को अपनी जड़ों से जोड़ पाएगा सिनेमा?
फिल्म ‘हनुमान अंश’ (Hanuman Ansh) की अप्रत्याशित सफलता ने साबित किया कि आस्था पर बनी छोटी फिल्म भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच सकती है।

हर धर्म के लोग देख रहे हनुमान अंश
HighLights
हर धर्म के लोग देख रहे हनुमान अंश
माइथोलॉजिकल फिल्मों को पसंद कर रहे लोग
7 अगस्त को रिलीज हुई थी फिल्म
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। करीब दो करोड़ रुपये के बजट में नीब करोरी बाबा के जीवन सफर पर बनी फिल्म को मिली अप्रत्याशित सफलता ने न सिर्फ निर्माताओं को चौंकाया है, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। इससे पहले ‘कृष्णावतारम पार्ट 1’, ‘लालो – कृष्ण सदा सहायते’ और ‘हनु मैन’ जैसी फिल्मों की सफलता भी इस बदलते रुझान की ओर इशारा कर चुकी है।
आगामी दिनों में कई धार्मिक फिल्में आने की तैयारी में हैं। क्या आस्था, तकनीक और बाजार का यह संगम भारतीय सिनेमा में धार्मिक फिल्मों के नए दौर की शुरुआत कर रहा है? इसकी पड़ताल करती थीम स्टोरी :
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राधा-कृष्ण पर फिल्म बनाएंगे करण जौहर
अब करण जौहर भी राधा और कृष्ण की कहानी पर आधारित एक फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। संजय मिश्रा ‘तेरा साईं’ नाम की फिल्म में साईं बाबा की भूमिका निभाते नजर आएंगे। वहीं, श्री खाटू श्याम जी पर भी फिल्म बनाई जा रही है। इसके अलावा ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ भी निर्माणाधीन है। दूसरी ओर, रणबीर कपूर की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘रामायणम्’ (Ramayana) दीवाली पर रिलीज होगी।
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क्यों बन रहीं माइथोलॉजिकल फिल्में?
विक्की कौशल अभिनीत महावतार भी निर्माणाधीन है। धार्मिक फिल्मों की ओर बढ़ते रुझान को ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन देश में पिछले कुछ वर्षों में बने व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल से जोड़कर देखते हैं। वह कहते हैं कि पिछले कुछ अर्से में देश में वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन में महाकाल लोक, अयोध्या में राम मंदिर, केदारनाथ का पुनर्विकास और सोमनाथ जैसे धार्मिक स्थलों के विकास ने लोगों को अपनी आस्था और संस्कृति से पहले की तुलना में अधिक गहराई से जोड़ा है।
जब समाज में भक्ति और आस्था का माहौल बनता है, तो उसी से जुड़ी कहानियां भी दर्शकों को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, अब लोग अपनी आस्था को लेकर पहले से कहीं अधिक मुखर हो गए हैं। उसी माहौल में अगर कुछ अच्छा आता है जो लोगों को अपील करे, तो वो पसंद किया जाता है। हनुमान अंश से पहले नीब करोरी बाबा पर फिल्म श्री बाबा नीब करोरी महाराज’ आई थी, लेकिन वह फिल्म नहीं चली। अगर फिल्म का कंटेंट अच्छा हो, अच्छी नीयत से बनाई हो तो चलेगी।
इन साउथ फिल्मों ने सेट किया ट्रेंड
इससे पहले साउथ हनु मैन, कंतारा, एनीमेशन फिल्म महावतार नरसिम्हा सफलता की इबारत लिख चुकी हैं। तो एक माहौल तो बन गया है कि धार्मिक फिल्में अगर अच्छी बनी होगी तो जरूर चलेगी। वैसे भी कोई फिल्म हिट हो जाए तो सब उस ओर ही चल पड़ते हैं।
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क्या कहना है कृष्णावतारम् के डायरेक्टर का?
वहीं लंबे अंतराल के बाद धार्मिक फिल्मों की ओर बढ़ते रुझान को लेकर ‘कृष्णावतारम : पार्ट 1’ (Krishnavataram: Part 1) के निर्देशक हार्दिक गज्जर कहते हैं कि नकारात्मक माहौल के बीच भगवान लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आते हैं। वह कहते हैं कि जय संतोषी मां’ की सफलता के बाद ‘आदिपुरुष’ जैसी फिल्में आईं। यह जॉनर पहले भी मौजूद था, लेकिन उस समय ऐसी फिल्मों की संख्या कम थी।
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अब इस तरह की फिल्मों के बनने का दायरा और रास्ता काफी व्यापक हो गया है। आस्था से जुड़ी चीजें हमें सकारात्मकता की तरफ ले जाती हैं। मेरा कृष्णावतारम को बनाने के पीछे वजह यही थी कि हम यह दिखाएं कि हमारे भगवान ने हमें सिखाया है कि प्यार से रहो, हर किसी से प्यार करो। सामान्य जीवन कैसे जिया जाता है? कर्म क्या है? मैंने इन्हीं बातों के आधार पर अपनी फिल्म बनाई है। यह हमारी संस्कृति है। हमारी धरोहर है।
उन्होंने आगे कहा, ' कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम कहा गया है। कृष्ण 16 कलाओं से पूर्ण थे। तो आपको हर कला को आगे लाना पड़ेगा। ये तो एक मात्र विषय था- प्रेम। कर्म पर उन्होंने पूरी गीता सार बताया है कि कैसे इंसान को जीना चाहिए, कैसे रहना चाहिए।
जेन जी के लिए बना रहे फिल्म?
कृष्णावतारम : पार्ट 2’ भगवान कृष्ण द्वारा सिखाई गई जीवन जीने की नीतियों और उनके जीवन-दर्शन पर आधारित है। ट्रायलॉजी के जरिए हमने तय किया कि उनकी फिलासफी को हम आगे लाएं और जेन जी भी उसे देखे। हमारे पास अगली पीढ़ी को देने के लिए यही है। हमारी जिम्मेदारी है कि प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करें। बाकी जब आप ऐसी फिल्म देखने जाते हैं, तो आपको सकारात्मकता का एहसास होता है, अपने विश्वास का एहसास होता है और आपको लगता है कि आप उस ईश्वर के और करीब आ रहे हैं।
हर धर्म के लोगों ने देखी 'नीम करौरी बाबा' की कहानी
अच्छी बात यह है कि मेरी फिल्म को हर धर्म के लोगों ने देखी है। ‘हनुमान अंश’ (Hanuman Ansh) की निर्माता अनुप्रिया का मानती हैं कि वर्तमान का धार्मिक सिनेमा पुरानी भक्तिपरक फिल्मों से अलग है। वह कहती हैं कि हमने इस फिल्म में महाराज जी की शिक्षाओं को सीधे तौर पर दिखाने की कोशिश नहीं की है, क्योंकि वह कभी उपदेश देने वाले व्यक्ति नहीं थे। इसी तरह हमने उनके चमत्कारों को सिर्फ चमत्कार की तरह पेश नहीं किया है। हमने उन्हें उनकी लीला के रूप में दिखाया है, क्योंकि वह उनके लिए लीला थी।
वह कहते थे कि संसार ही मेरा परिवार है। लोगों को भोजन कराना, भक्तों को प्रसाद देना, हनुमानजी, प्रभु राम का नाम लो। हमने उसी नजरिए को पर्दे पर दिखाने की कोशिश की है। फिल्म में महाराज जी के बाल रूप का एक दृश्य है, जिसमें कुछ लोग बच्चों के साथ भेदभाव कर रहे थे, लेकिन उन्होंने दूसरी जाति के बच्चों समेत सभी को खाना खिलाया। यह उनकी विचारधारा, मानवता और समानता के संदेश
को भी रेखांकित करती है।
हमारे पास है माइथोलॉजिकल कहानियों का भंडार
यह फिल्म दो पार्ट में बन रही हैं। अगले पार्ट पर जल्द ही काम शुरू होगा। इसमें दोराय नहीं कि भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं में कहानियों की कोई कमी नहीं है। हार्दिक कहते हैं हमारे पास पांच तंत्र हैं, शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग जैसे अनगिनत विषय हैं। ये सिर्फ चमत्कारों की कहानियां नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे वैज्ञानिक और तार्किक पहलू भी मौजूद हैं।
हमारा उद्देश्य किसी एक धर्म की ओर लोगों को झुकाना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति और विरासत के प्रति जागरूक करना है। आप जिस जमीन पर पैदा हुए हैं, वहां की संस्कृति और संस्कार आपके भीतर आना स्वाभाविक है। मुझे नहीं लगता कि हमें अपनी जड़ों और विरासत से दूर जाने की जरूरत है।
