नई दिल्ली, अमित कर्ण। छठे जागरण फिल्म फेस्टिवल की फिजाओं में सिने प्रेमिओं को भारत की ज्यादातर भाषाओं की फिल्में मिल रही हैं। साथ ही विदेशी फिल्मों का आनंद भी वे खूब ले रहे हैं। फेस्टिवल में अमेरिका तो एसोसिएट पार्टनर है। अमेरिकन सेंटर में उसके तहत अमेरिका की कल्ट फिल्में भी दिखाई जा ही हैं। सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में अमेरिका, यूरोप व अन्य एशियाई देशों की फिल्मों का मजा दर्शक ले चुके हैं।

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सिनेप्रेमियों में सबसे ज्यादा उत्सुकता 'आर्गो', 'बर्डमैन', 'कासाबलांका', 'लाइफ इज ब्यूटीफुल', 'गॉन गर्ल', 'गॉन विद द विंड', 'गॉड्स' को लेकर तो रही ही, 'द मड विमेन', 'द गोल्डन एरा', 'लॉरेक', 'ब्राह्मण बुल्स', 'टू विमेन', 'विक्टोरिया' को लेकर भी रही। उपरोक्त फिल्में देखने विदेशी दर्शकों की अच्छी-खासी तादाद जुटी। देसी दर्शकों को भी फिल्मों के जरिए अन्य देशों की कला, संस्कृति, खानपान के बारे में जानने-समझने का मौका मिला।

फेस्टिवल के प्रवक्ता के मुताबिक, 'हमने इरादतन विदेशी कल्ट व पॉपुलर फिल्मों की स्क्रीनिंग कराई। इससे सिने प्रेमी व फिल्म निर्माण के इच्छुक दोनों बिरादरी को फायदा मिला। जागरण फिल्म फेस्टिवल का असल मकसद भी यही है कि फिल्म को जुनून की हद तक प्यार करने वाले फेस्टिवल से कुछ नया और विलक्षण अनुभव लेकर जाएं।'

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मिसाल के तौर पर माया विटकोवा की फिल्म 'विक्टोरिया सनडांस' से लेकर 'रोट्रेडम' और 'गोटेबर्ग' इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की शान रह चुकी है। आठवें दशक में जब यूरोप में कम्यूनिज्म ध्वस्त हो रहा था, तब बुल्गारिया की एक महिला बोरयाना बच्ची पैदा नहीं करना चाहती थी, लेकिन किस्मत को वह मंजूर नहीं था। उसकी कोख से विक्टोरिया जन्म लेती है। वह बच्ची आगे चलकर कम्यूनिस्ट बुल्गारिया का प्रतीक बनती है। लब्बोलुआब यह कि इस कहानी में इमोशन और पॉलिटिकल बैकड्रॉप दोनों बेहद व्यापक और इंटेंस हैं।

ठीक इसी तरह 'ब्राह्मण बुल्स' एक ऐसे आर्किटेक्ट की कहानी है, जिसका जिंदगी, रिश्ते-नातों से मोहभंग हो चुका है। अनायास वह एक दिन अपने पिता से सालों बाद मिलता है। उसकी जिंदगी खुशी से गुलजार होने लगती है, मगर पिता की पुरानी दोस्त की जिंदगी में आते ही पिता-पुत्र के रिश्ते में दरारें आती हैं। इस बेहतरीन फिल्म के बारे में कम लोगों को जानकारी थी, मगर यह ढेर सारे प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल की शान रह चुकी हैं।

इसी तरह 'लोरेक' में एक ऐसी युवती एनी की कहानी है, जिसे अचानक से हफ्ते दर हफ्ते फूलों का गुलदस्ता मिलने लगता है। वह भी किसी अंजान की तरफ से। फिर वह उस अंजान की खोज में कैसे निकलती है। उस अंजान शख्स का नाता उसके अतीत व वर्तमान से क्या है, 'लोरेक' उसकी गहन पड़ताल है। ऐसी फिल्मों में जीवन व रिश्तों का गहन दर्शन है। फेस्टिवल के आखिरी दिन पौलेंड की 'श्रेयूज नेस्ट', रूस की 'पोस्टमैंस ह्वाइट नाइट' प्रमुख हैं। अरब व ईरान की शॉर्ट फिल्में तो लोगों को भा रही हैं। हमारे फेस्टिवल में विदेशी फिल्मों के इस बुके से दर्शक खुश हैं। वे हमारा शुक्रिया अदा कर रहे हैं, जिसके हम आभारी हैं। अगले साल हम इससे और भी इजाफा करेंगे।

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Posted By: Monika Sharma

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