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9 भाषाएं, 24 फिल्में, सिनेमा में 98 साल पुराना और गहरा है Devdas का इतिहास

By Sandeep BhutoriaEdited By: Ashish Rajendra
Published: Sun, 12 Jul 2026 01:49 PM (IST)

भारतीय सिनेमा जगत में लेखक शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का कालजयी उपन्यास देवदास फिल्ममेकर्स की पहली पसंद रहा है।

सिनेमा का देवदास (फोटो क्रेडिट- जागरण)

सिनेमा का देवदास (फोटो क्रेडिट- जागरण)

HighLights

  1. फिल्ममेकर्स की पहली पसंद रही देवदास की कहानी

  2. पीढ़ी दर पीढ़ी पर्दे पर दिखी अनोखी प्रेम कहानी

  3. सिनेमा में 98 सालों का देवदास का इतिहास

संदीप भूतोड़िया, मुंबई। स्व. शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का कालजयी उपन्यास देवदास एक शताब्दी से भारतीय सिनेमा की धड़कन बना हुआ है। संदीप भूतोड़िया के अनुसार यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि मानवीय कमजोरियों और बदलते सामाजिक मूल्यों का ऐसा जीवंत आईना है जो हर पीढ़ी को अपना सा लगता है...

सिनेमा में साहित्य

भारतीय साहित्य की बहुत कम कृतियों को सिनेमा की दुनिया में ऐसा जादुई और असाधारण जीवन मिला है, जैसा शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के कालजयी उपन्यास देवदास को मिला। वर्ष 1917 में प्रकाशित यह लघु उपन्यास एक युवा जमींदार के बेटे देवदास की कहानी कहता है। देवदास का अपने बचपन के प्यार पार्वती (पारो) के साथ रिश्ता पारिवारिक घमंड और कठोर सामाजिक रूढ़ियों की भेंट चढ़ जाता है।

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अपनी दुविधा और भावनात्मक कमजोरी के कारण देवदास पारो को एक अधिक अमीर परिवार में ब्याहे जाते हुए देखता है। इसके बाद शराब की लत में डूबकर वह तवायफ चंद्रमुखी के संपर्क में आता है, जिसकी सच्ची सहानुभूति देवदास की जीवन से भागने की लाचारी से बिल्कुल अलग दिखती है। यह कहानी भारतीय साहित्य के सबसे दर्दनाक मोड़ पर खत्म होती है, जहां देवदास आखिरी बार पारो से मिले बिना उसके घर के बाहर दम तोड़ देता है।

तैयार हुआ सिनेमाई ढांचा

पर्दे पर इस कहानी का सफर वर्ष 1928 में नरेश मित्रा के निर्देशन में बनी एक मूक फिल्म से शुरू हुआ था। इतिहास के लिहाज़ से भले ही इसका महत्व था, लेकिन पी.सी. बरुआ के 1935 के बंगाली रूपांतरण ने देवदास को एक बड़ी सिनेमाई घटना में बदल दिया। बरुआ ने खुद मुख्य भूमिका निभाकर किरदार में एक शांत मनोवैज्ञानिक स्वाभाविकता दिखाई, जो उस दौर के लिए बिल्कुल नई थी।

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इसकी भारी सफलता के बाद उन्होंने अगले ही वर्ष इसे हिंदी में बनाया और के.एल. सहगल को कास्ट किया। सहगल के अभिनय और अमर गानों ने पूरे भारत में देवदास को अमर कर दिया। बरुआ ने बाद में इसका असमिया संस्करण भी बनाया, जिससे यह भारतीय सिनेमा के शुरुआती बहुभाषी प्रोजेक्ट्स में से एक बना। बरुआ ने अकेले ट्रेन का सफर और बंद दरवाजों के बाहर मौत जैसे दृश्यों से एक ऐसा विजुअल ढांचा तैयार किया, जिसे बाद के निर्देशक हमेशा दोहराते रहे।

लांघ दी भाषा की सीमाएं

बंगाल से निकलकर यह कहानी बहुत जल्द दक्षिण भारत और विदेशी सिनेमा तक फैल गई। वर्ष1953 में वेदांतम राघवय्या के निर्देशन में तेलुगु और तमिल में एक साथ देवदास आई, जिसमें अक्किनेनी नागेश्वर राव ने ऐसा दमदार अभिनय किया कि दक्षिण भारत के दर्शकों के लिए वे ही असली देवदास बन गए।

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इसके बाद 1974 में एक और तेलुगु रीमेक बना। भारतीय सिनेमा के इतिहास में इस कहानी का सबसे प्रसिद्ध क्लासिक रूपांतरण बिमल राय की 1955 की हिंदी फिल्म देवदास को माना जाता है। दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला के अभिनय से सजी इस फिल्म ने खामोश दर्द को पर्दे पर उतारा, जिसने दिलीप कुमार को ट्रैजेडी किंग का खिताब दिलाया।

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इसके बाद के दशकों में सौमित्र चटर्जी और प्रसेनजीत चटर्जी जैसे कलाकारों के साथ बंगाली, मलयालम और उर्दू में भी इसके कई रीमेक बने। यहां तक कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इसके कई सफल संस्करण तैयार किए गए।

दुनिया के सामने भव्य प्रदर्शन

वर्ष 2002 में संजय लीला भंसाली की देवदास के साथ इस कहानी में एक बहुत बड़ा और नाटकीय बदलाव देखने को मिला। शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित के अभिनय से सजी इस फिल्म ने यथार्थवाद को पूरी तरह छोड़कर एक भव्य और ओपेरा जैसी नाटक शैली को अपनाया।

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आलीशान सेट, चमचमाते महंगे कपड़े और गानों के भव्य दृश्यों ने शरत चंद्र की इस भावुक और शांत त्रासदी को एक विशाल सिनेमाई उत्सव में बदल दिया। कान फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के बाद इस फिल्म को वैश्विक पहचान मिली और दुनिया भर के दर्शकों ने देवदास को जाना।

जहां पुरानी शैली के आलोचक इसके भारी तड़क-भड़क पर सवाल उठा रहे थे, वहीं भंसाली ने यह साबित कर दिया कि कहानी की मूल आत्मा को खोए बिना इसे नए युग की भव्यता के साथ पेश किया जा सकता है।

आधुनिक शहरी संदर्भ भी मिले

भंसाली ने यदि इस कहानी को भव्यता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, तो निर्देशक अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म देव.डी (2009) में इसे पूरी तरह से तोड़-मरोड़ कर एक नया रूप दे दिया। कश्यप इस कहानी को आधुनिक पंजाब और दिल्ली के माहौल में ले आए, जहां पुराने जमाने के मेलोड्रामा की जगह उलझे हुए आधुनिक रिश्तों, नशे की लत और शहरी अकेलेपन ने ले ली।

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अभय देओल का देव पारंपरिक रूप से दुखी रहने वाले नायक के बजाय एक नासमझ लड़का था। माही गिल की पारो ने अपने फैसले खुद लेने की हिम्मत दिखाई और कल्कि कोचलिन की चंद्रमुखी (चंदा) त्याग की मूर्ति बनने के बजाय मुश्किलों से लड़कर खड़ी होने वाली आधुनिक लड़की बनी। नियान लाइट वाले दृश्यों और डार्क ह्यूमर ने देव.डी को किसी साहित्यिक क्लासिक का सबसे साहसी रूपांतरण बना दिया।

सांस्कृतिक रूप से गहरा प्रभाव

आज भारतीय समाज में देवदास नाम ही खुद को बर्बाद करने वाले प्रेमी का प्रतीक बन चुका है। देवदास का प्रभाव सिर्फ सीधे रूपांतरणों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका ढांचा भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में बहुत गहराई से समा गया। गुरु दत्त की कागज के फूल(1959) में फिल्म के भीतर देवदास की शूटिंग दिखाई गई, तो हाथ की सफाई (1974) में रणधीर कपूर और हेमा मालिनी इसके किरदारों के रूप में एक स्टेज शो पर थिरके।

मुकद्दर का सिकंदर जैसी सुपरहिट फिल्म ने इसी के भावनात्मक ताने-बाने का इस्तेमाल किया। सुधीर मिश्रा की दास देव और वेब सीरीज देव डीडी ने तो देवदास, पारो और चंद्रमुखी के जाने-पहचाने रिश्तों को उलटकर एक नया नजरिया दिया। यहां तक कि कन्नड़ फिल्म मुंगारू माले में एक पालतू खरगोश का नाम देवदास रखा गया और क्या सुपर कूल हैं हम जैसी कामेडी फिल्म में भी इसका मजेदार संदर्भ दिखा।

हर पीढ़ी ढूंढती है अपनी कहानी

आखिर क्यों एक अकेले उपन्यास ने लगभग एक शताब्दी में फिल्म निर्माताओं को इतना आकर्षित किया? इसका जवाब इसके असाधारण भावनात्मक कथ्य में छिपा है। देवदास कोई पारंपरिक नायक नहीं है, बल्कि कमियों से भरा एक कमजोर पुरुष है जो कदम उठाने के बजाय खुद पर तरस खाना चुनता है।

यही धुंधलापन हर पीढ़ी को अपने मूल्यों के अनुसार उसकी नई व्याख्या करने की अनुमति देता है। इसके साथ ही पारो और चंद्रमुखी के किरदार भी समय के साथ काफी मजबूत हुए हैं। वे अब त्याग की मूर्ति मात्र रहने के बजाय अपने फैसले खुद लेने वाली दृढ़ और स्वतंत्र महिलाएं बनकर उभरी हैं, जो कहानी का मुख्य केंद्र हैं।

दरअसल हर नया दौर इसके संघर्षों में नई प्रासंगिकता ढूंढ लेता है। इसीलिए बदलते समय, भाषाओं और पीढ़ियों के बीच देवदास आज भी पर्दे पर उतना ही जीवित और प्रासंगिक है, जितना एक शताब्दी पहले था।

  • 1917 में प्रकाशित शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास देवदास पर 1928 में पहली बार एक फिल्म बनाई गई। इस मूक फिल्म ने सिनेमा जगत का ध्यान इसके असाधारण कथ्य की ओर खींचा। 

  • 24 फिल्में अब तक बनी हैं देवदास उपन्यास पर। 

  • 9 से ज्यादा भारतीय भाषाओं में पर्दे पर उतरी है देवदास की कहानी। यह हैं हिंदी, बंगाली, तेलुगु, तमिल,मलयालम, असमिया, भोजपुरी, ओड़िया और उर्दू। अकेले निर्देशक पी.सी. बरुआ ने ही 3 अलग भाषाओं (बंगाली, हिंदी, असमिया) में इस पर तीन फिल्में बनाईं।