अनुप्रिया वर्मा, मुंबई। डायरेक्टर असीम अहलूविलाया की फिल्म डैडी एक पीरियड ड्रामा फिल्म है। इस फिल्म में उनके लिए वह पीरियड क्रियेट करना उतना आसान नहीं रहा। असीम का कहना है, हमारी कहानी 70 के दशक की है और अब सबकुछ बदल चुका है। अभी जबकि हमने रियल लोकेशन का ही इस्तेमाल ज्यादातर किया है। फिर भी वह फील लाना मुश्किल था। चूंकि अब मुंबई में वे बिल्डिंग बदल चुकी हैं। अंदर के इंटीरियर्स बदल चुके हैं।

असीम बताते हैं कि, इस फिल्म में हमने काफी रीक्रियेट किया है। पुराने पिक्चर्स देखकर कि यहां ये वॉल पेपर हुआ करता था। तो वैसा रीक्रियेट किया है। ताकि लुक लाइक्स किया है। तस्वीरों का अधिक इस्तेमाल किया है। गवली के परिवार से काफी मदद मिली। रेस्टोरेंट बदल चुके हैं। पुराने रेस्टोरेंट हैं भी तो उसमें ग्रैनाइट लग चुका है। अब वह पीरियड फील महसूस होना कठिन है। यही नहीं डैडी बनाते हुए मुझे सारे किरदारों के लिए कपड़ों का चुनाव करने में दिक्कत हुई। इसलिए भी भारत में आॅथेंटिक पीरियड ड्रामा बनाना मुश्किल हो जाता है कि आपको एग्जैक्ट चीजें नहीं मिलती हैं। उस दौर में टिपिकल प्रिंट्स वाली साड़ियां होती थीं। वह साड़ियां मैं ढूंढ कर थक चुका था। लेकिन मुझे नहीं मिलती थी। वह अब सिर्फ डिजिटल ही तैयार हो सकती थीं। 70 के दशक में जो शर्टस के प्रिंट्स होते थे, अब वह मिलना नामुमकिन है। लेकिन मेरी कॉस्टयूम डिजाइनर्स डिपार्टमेंट ने इस पर खूब काम किया। वे लोग नासिक गये, सोलहापुर गये। इंटीरियर्स में गये। रामा नायक, बाबू रेशम जैसे किरदारों के कॉस्टयूम पर भी ध्यान दिया है।बाबू रेशम जिस तरह के टीशर्ट पहनते थे, वह टाइट पैंट पहनते थे। चूंकि वह फैट थे। लेकिन सोचते थे कि मैं स्लिम हूं। ये दिखाने के लिए तो कूल टाइट टीशर्ट जो लियोनियम के बने होते थे। वैसे टी शर्ट आज मिलना मुश्किल थे। लेकिन मेरे डिपार्टमेंट ने मेहनत की।

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यहां तक कि उस दौर के गन्स भी अब नहीं मिलते हैं और फिर इसके रीक्रियेट करने में बजट अधिक लग जाता है। लेकिन अर्जुन ने कभी मुझे मना नहीं किया। लेकिन असीम बताते हैं कि डैडी में उन्होंने कई नॉन एक्टर्स को भी दिखाया है, जो फिल्म में नज़र भी आये। उस चॉल के लोगों को भी शामिल कर लिया था। इसकी वजह से बजट मैनेज भी किया है।

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