मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। Maharashtra assembly elections 2019 दलित नेता प्रकाश आंबेडकर एक बार फिर खेल बिगाड़ने वाले दल की भूमिका निभाने को तैयार बैठे हैं। लोकसभा चुनाव में आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के कारण कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को करीब एक दर्जन सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा था। इस बार उनकी पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) सूबे की 288 में से 274 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 

डॉ. भीमराव आंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करने वाले उनके 65 वर्षीय पौत्र प्रकाश आंबेडकर ने लोकसभा चुनाव में जहां ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद मुस्लमीन (एआईएमआईएम) के साथ गठबंधन किया था, वहीं इस बार वह महाराष्ट्र में अकेले ताल ठोंक रहे हैं। क्योंकि लोकसभा चुनाव में एमआईएम के साथ गठबंधन करके लड़ने के कारण औरंगाबाद की एक सीट पर एमआईएम के उम्मीदवार इम्तियाज जलील तो बाजी मार ले गए, लेकिन आंबेडकर का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका। इससे खीझे प्रकाश आंबेडकर ने यह कहते हुए एमआईएम से नाता तोड़ लिया कि गठबंधन होने के बावजूद दलित वोट तो एमआईएम को मिल जाते हैं, लेकिन मुस्लिम वोट बाकी गैरमुस्लिम उम्मीदवारों को नहीं मिलते। 

  

दलित नेता रामदास आठवले के भारतीय जनता पार्टी के साथ चले जाने के बाद दक्षिणपंथी विचारधारा से दूरी रखने वाला नवबौद्ध दलित समाज बेसहारा महसूस कर रहा था। दो साल पहले हुई भीमा-कोरेगांव की घटना के बाद जब इस वर्ग के दलितों की कमान प्रकाश आंबेडकर ने थामी, तो इस वर्ग को नेतृत्व मिल गया। वर्षों से राजनीतिक वनवास झेल रहे प्रकाश आंबेडकर की उसके बाद से पौ बारह हो गई। लोकसभा चुनाव में उन्होंने दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने के लिए हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी को साथ लेकर वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) बनाई । इस गठबंधन ने राज्य में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को  भारी नुकसान पहुंचाया। वंचित बहुजन आघाड़ी को लोकसभा चुनाव में करीब 40 लाख से ज्यादा वोट मिले। जिसके कारण कांग्रेस को करीब छह, राकांपा को दो और उनके सहयोगी दल स्वाभिमानी शेतकरी संगठन को दो सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा। वीबीए का नुकसान औरंगाबाद में शिवसेना को भी उठाना पड़ा, जहां उसके दिग्गज नेता चंद्रकांत खैरे चुनाव हार गए।   इस सीट पर कांग्रेस तो चौथे स्थान पर जा पहुंची थी। 

प्रकाश आंबेडकर की वीबीए को करीब आधा दर्जन सीटों पर डेढ़ लाख से ज्यादा, और लगभग इतनी सीटों पर एक लाख से ज्यादा वोट मिले थे। 50 हजार से अधिक मत तो उसे कई सीटों पर हासिल हुए थे। स्वयं प्रकाश आंबेडकर सोलापुर और अकोला, दो स्थानों से लड़े थे। सोलापुर में कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की हार का कारण आंबेडकर को 1,70,007 वोट मिलना रहा । अकोला सीट पर भी प्रकाश को 2,78,848 वोट मिले थे। नांदेड़ में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण की हार में भी वंचित बहुजन आघाड़ी की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।   

लोकसभा चुनाव में दिखी उनकी इस ताकत के कारण कांग्रेस विधानसभा चुनाव में उनसे समझौता करना चाहती थी। लेकिन प्रकाश आंबेडकर कांग्रेस को 50 से भी कम सीटें देने को तैयार थे। इसके अलावा उनकी एक शर्त यह भी थी कि कांग्रेस उनसे समझौता कर रही है तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को छोड़ दे। कांग्रेस को यह शर्त भी मान्य नहीं थी। जिसके कारण उनका कांग्रेस से समझौता नहीं हो सका। अब 274 सीटों पर वीबीए के उम्मीदवार खड़े करके वह मैदान में हैं और उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी उनकी पार्टी कांग्रेस-राकांपा को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन कांग्रेस-राकांपा इससे सहमत नहीं हैं। युवक कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव अभिजीत भोसले कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में आंबेडकर की भूमिका से भाजपा को मिले लाभ की बात अब उनका मतदाता जान चुका है। इसलिए इस बार वह सिर्फ वोट काटने के लिए उनके साथ नहीं जाएगा। 

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अभिजीत की बात को बल मिलता है कभी प्रकाश आंबेडकर के ही साथी रहे दलित चिंतक लक्ष्मण माने द्वारा उनका साथ छोड़ देने से। माने साफ कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में प्रकाश आंबेडकर की भूमिका ने उनके समर्थन दलितों को निराश किया है। उन्हें बड़े पैमाने पर मिले वोटों का सीधा लाभ भाजपा को हुआ है। माने कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में भी ऐसी कई सीटें हैं, जहां वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार 10,000 से ज्यादा वोट ले सकते हैं। इसका नुकसान कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को ही होगा। 

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Posted By: Babita kashyap

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