भोपाल। तमाम वादों, दावों के बीच आज जनता ने अपना फैसला सुना दिया। कई सीटों पर जहां दिग्गजों को हार का मुंह देखना पड़ा तो कई सीटों पर चौंकाने वाले नतीजे देखने को मिले। इस बार के विधानसभा चुनाव में वंशवाद का मुद्दा भी जमकर उछला था, लेकिन फिर भी दोनों ही पार्टियों में नेता पुत्रों और रिश्तेदारों को दिल खोलकर टिकट दिए। ऐसे में उन सीटों के नतीजों पर सबकी नजर थी, जहां से दिग्गज नेताओं के बेटे या रिश्तेदार चुनावी मैदान में कूदे थे।

प्रदेश की सबसे हाई प्रोफाइल सीट थी इंदौर- तीन नंबर

इस कड़ी में सबसे हाई प्रोफाइल सीट इंदौर की विधानसभा तीन थी। यहां से भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश चुनावी मैदान में थे। उनका सामना तीन बार के विधायक अश्विन जोशी से था और इस लड़ाई में आकाश भारी पड़े और चार हजार से ज्यादा वोटों से उन्होंने जीत दर्ज की। सबसे छोटी विधानसभा होने की वजह से उम्मीद यही थी कि इस सीट का नतीजा सबसे पहले आएगा। लेकिन मामला उलट रहा।

दोनों उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। हर राउंड के साथ कभी अश्विन तो कभी आकाश बढ़त बनाते दिखे। लेकिन कुछ राउंड में तो बढ़त का अंतर कुछ सौ वोटों तक आकर सिमट गया। ऐसे में जीत-हार को लेकर दोनों ही उम्मीदवारों की सांसें ऊपर-नीचे होती रहीं। लेकिन आखिर में बाजी आकाश ने मारी।  

सांची सीट पर सबकी नजर

इसके अलावा सांची सीट पर भी सबकी नजर है। यहां भाजपा सरकार के वरिष्ठ मंत्री डॉ गौरीशंकर शेजवार ने इस बार अपनी जगह बेटे मुदित को चुनावी मैदान में उतारा था। लेकिन उनका ये दांव फेल होता दिख रहा है। क्योंकि मुदित आखिरी कुछ राउंड में पिछड़ गए हैं। फिलहाल वो कांग्रेस उम्मीदवार डॉ प्रभुराम चौधरी से पांच हजार से ज्यादा वोटों से पीछे चल रहे हैं। ऐसे में उनके लिए वापसी मुश्किल दिख रही है। 

पचौरी पर भारी पड़े पटवा

2013 के प्रतिद्वंदी एक बार फिर इस बार आमने-सामने थे। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता सुंदरलाल लाल पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा का मुकाबला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी से था। पिछली बार की तरह इस बार भी बाजी सुरेंद्र पटवा ने मारी है। वो लगभग 27 हजार वोटों से आगे चल रहे थे। 

राघौगढ़ में दिग्गी राजा के बेटे जयवर्धन जीत के करीब

राघौगढ़ दिग्विजय सिंह की परंपरागत सीट है। इस बार फिर पार्टी ने दिग्गी राज के बेटे जयवर्धन सिंह को मौका दिया था।वो पिछले चुनाव में इसी सीट से जीते थे और इस बार भी उनका जादू बरकरार दिख रहा है। वो फिलहाल चालीस हजार वोटों से आगे चल रहे हैं। ऐसे में उनकी जीत भी तय मानी जा रही है। इस सीट से उनका मुकाबला भाजपा के भूपेंद्र सिंह रघुवंशी से था। 

पिछली बार तो चुनाव प्रचार में उन्हें सियासी रणनीति बनाने में माहिर दिग्विजय सिंह का साथ मिला था। लेकिन इस बार पिता सियासी समर से दूर रहे। जयवर्धन इस बार अकेले मैदान में थे। ऐसे में इस सीट की जीत-हार से न सिर्फ उनका सियासी भविष्य तय होगा, बल्कि दिग्गी राजा का भविष्य भी इसके इर्द-गिर्द घूमेगा। 

अटेर में कांटे की टक्कर 

इसके अलावा अटेर सीट के नतीजों पर भी सबकी निगाहें थीं। क्योंकि इस सीट से नेता प्रतिपक्ष रहे सत्यदेव कटारे के बेटे हेमंत चुनावी मैदान में जो थे। पिता की मौत के बाद हुए उपचुनाव में सहानुभूति के सहारे हेमंत ने चुनावी नैया पार की थी। उपचुनाव में उनका सामना अरविंद सिंह भदौरिया से था। इस बार भी वो ही चेहरा उनके सामने था। लेकिन पिछली बार की तरह इस बार की चुनावी राह उनके लिए आसान नहीं थी। क्योंकि चुनाव से कुछ महीनों पहले ही हेमंत एक सीडी कांड में उलझ गए थे। इसकी वजह से उनकी काफी किरकिरी हुई थी। 

फिलहाल वोटों की गिनती के बाद भी तस्वीर कुछ ऐसे ही नजर आ रही है, क्योंकि हेमंत लगभग डेढ़ हजार वोटों से आगे चल रहे हैं। ऐसे में पासा किसी भी तरफ पलट सकता है। 

Posted By: Saurabh Mishra

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