[अभिषेक रंजन सिंह]। कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी तथा कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ सकती है, इसका अंदाजा सिद्दरमैया को भी था। अगर ऐसा नहीं होता तो दलित को मुख्यमंत्री बनाने और खुद चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा वह नहीं करते। नतीजों से एक बात तो स्पष्ट है कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका फायदा मिलेगा। वहीं अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल जरूर उठेंगे कर्नाटक के चुनावी नतीजे से ज्यादा हैरानी कांग्रेस का जेडीएस को बिना शर्त समर्थन करने की घोषणा से हुआ।

राज्य में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी और कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवानी पड़ सकती है इसका अंदाजा सिद्दरमैया को भी था। अगर ऐसा नहीं होता तो दलित को मुख्यमंत्री बनाने और स्वयं चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा वह नहीं करते। चुनाव से पहले उन्होंने लिंगायत समुदाय को पृथक धर्म की मान्यता देने की घोषणा की ताकि भाजपा का परंपरागत मतदाता कांग्रेस के साथ आ जाए, लेकिन चुनावी फायदे की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस को लिंगायत मतदाताओं का समर्थन मिलना तो दूर राज्य की अन्य प्रभावशाली जातियां भी उससे नाराज हो गईं।

साल 2013 के चुनाव में बीएस येद्दयुरप्पा के अलग होने का नुकसान भाजपा को झेलना पड़ा, लेकिन लोकसभा चुनाव में उनकी वापसी का सीधा फायदा पार्टी को मिला। संसदीय चुनाव में भाजपा ने राज्य की करीब 144 विधानसभा सीटों पर अपनी बढ़त बनाई, लेकिन इस विधानसभा चुनाव में भाजपा 104 सीटें जीतने में कामयाब रही। अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो भाजपा को जहां 36 फीसद वोट मिले वहीं कांग्रेस को कुछ ज्यादा यानी 38 फीसद, लेकिन सीटों के मामले में कांग्रेस भाजपा से पीछे रह गई।

कर्नाटक में कांग्रेस सिद्दरमैया के विकास कार्यों एवं जनहित से जुड़ी योजनाओं के मुद्दे पर चुनावी समर में उतरी, लेकिन भाजपा उनके शासन में हुए भ्रष्टाचार और मुस्लिम तुष्टीकरण के मुद्दे पर कांग्रेस पर हमलावर रही। नि:संदेह सिद्दरमैया ने बीते पांच वर्षों में कर्नाटक में कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं, लेकिन सक्षम निगरानी के अभाव में उन योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच सका। जिस तरह चुनाव से पहले कांग्रेस ने लिंगायत कार्ड खेलकर सियासी हलचल पैदा की। उसी प्रकार संख्याबल में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद उसने जेडीएस को समर्थन देने की घोषणा कर सबको अचंभित किया। हालांकि कांग्रेस का यह दांव कितना सफल होता है वह अगले कुछ दिनों में पता चलेगा। वैसे कांग्रेस और भाजपा राज्य में नई सरकार बनाने का दावा कर रही हैं। दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता राजभवन में राज्यपाल से मिल चुके हैं और अंतिम फैसला अब राज्यपाल को करना है। कर्नाटक के चुनावी परिणाम में कई बातें बेहद स्पष्ट हैं।

पहली बात इस चुनाव में भाजपा उन सभी इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाने में कामयाब रही। जहां पिछली बार उसे काफी नुकसान हुआ था। केरल से सटे तटीय कर्नाटक जहां कुल 21 सीटें हैं वहां भाजपा 16 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि कांग्रेस को महज तीन सीटें मिलीं। इस इलाके में आरएसएस का काफी प्रभाव है। यहां मिली कामयाबी का फायदा भाजपा को केरल में होने वाले आगामी चुनाव में मिल सकता है। पुराने मैसूर क्षेत्र की बात करें तो यहां जेडीएस का प्रभाव माना जाता है। यहां अमूमन जेडीएस और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला होता आया है, लेकिन इस बार भाजपा को यहां 16 सीटें मिली हैं। जबकि जेडीएस और कांग्रेस क्रमश: 27 और 20 सीटें जीतने में कामयाब रहीं। मुस्लिम और वोक्कालिगा बहुल इस इलाके में भाजपा ने किस तरह अपनी पैठ बनाई। इसका अंदाजा हासन सीट से भाजपा की जीत से लगाया जा सकता है। यह पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा का गृह जिला है।

मध्य कर्नाटक की बात करें तो किसी जमाने में यह कांग्रेस और समाजवादियों का गढ़ कहलाता था। राज्य के चार मुख्यमंत्रियों का संबंध इसी इलाके से रहा है। यहां विधानसभा की कुल 23 सीटों में भाजपा सोलह, कांग्रेस चार और जेडीएस 3 सीटें जीतने में कामयाब रहीं। बीएस येद्दयुरप्पा का संबंध मध्य कर्नाटक से है। शिमोगा जिले के शिकारीपुर सीट से वह विजयी रहे। वहीं जिले की सभी पांच सीटों पर भाजपा उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। पिछले चुनाव में कांग्रेस को यहां बड़ी कामयाबी मिली थी। हैदराबाद कर्नाटक की कुल चालीस सीटों में कांग्रेस 21, भाजपा सोलह और जेडीएस चार सीटें जीतने में सफल हुईं।

पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा ने यहां बेहतर प्रदर्शन किया है। चुनाव से पहले आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा के सवाल पर मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू एनडीए अलग हो गए थे। कर्नाटक चुनाव में भाजपा का खेल खराब करने के लिए वह तेलुगुभाषियों से जेडीएस के पक्ष में मतदान करने की अपील भी कर चुके थे। माना जा रहा था कि उनकी अपील से भाजपा को नुकसान हो सकता है, लेकिन हैदराबाद कर्नाटक में भाजपा को मिली कामयाबी का असर अगले साल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव पर जरूर पड़ेगा।

वहीं मुंबई कर्नाटक जहां विधानसभा की पचास सीटें हैं वहां भाजपा तीस सीटों पर विजयी हुई है। पिछले चुनाव के मुकाबले यह संख्या दोगुनी से भी अधिक है। महाराष्ट्र से सटे इस इलाके को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन पिछले चुनाव में बीएस येद्दयुरप्पा की अलग राह चुनने से भाजपा को काफी नुकसान झेलना पड़ा था। पानी की किल्लत यहां की मुख्य समस्या है। कर्नाटक में बीते पांच वर्षों में साढ़े तीन हजार किसानों ने आत्महत्या की है। उनमें ज्यादातर खुदकुशी करने वाले यहीं के किसान थे। कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने किसान आत्महत्या के सवाल पर कांग्रेस पर तीखे हमले किए। बेंगलुरु कर्नाटक में इस बार गैर कन्नड़ भाषियों खासकर हिंदी भाषियों की वजह से पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा को चार सीटों का फायदा हुआ है।

कर्नाटक के चुनावी परिणाम से दो-तीन बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं कि सीटों के मामले में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में कांग्रेस आगे रही। इस चुनाव में खास बात यह रही कि लिंगायत मतदाता, जो कि भाजपा के परंपरागत मतदाता हैं, उसे पार्टी बचाने में कामयाब रही। इसके अलावा वोक्कालिगा और अन्य पिछड़ी जातियां, जो जेडीएस और कांग्रेस के मतदाता रहे हैं, उनका समर्थन भी भाजपा को मिला है। कर्नाटक में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए क्रमश: छत्तीस व पंद्रह सीटें आरक्षित हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों में छह और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में केवल एक सीट हासिल हुई थीं, लेकिन इस बार यह आंकड़ा कहीं ज्यादा है। खासकर अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर। गुजरात और त्रिपुरा के चुनावों में भी आदिवासी इलाकों में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिली थी। इसमें कोई शक नहीं कि हालिया कुछ वर्षों में आदिवासियों का रूझान भाजपा की तरफ बढ़ा है। इसके पीछे अकेले भाजपा की मेहनत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वर्षों की मेहनत है।

जेडीएस और बीएसपी कर्नाटक में साथ मिलकर चुनाव लड़े। कर्नाटक में दलितों की संख्या करीब सोलह फीसद है। यहां दलितों की हिमायत वाली कोई पार्टी नहीं है इसलिए दलितों का अधिकांश वोट कांग्रेस के खाते में जाता था। जेडीएस और बीएसपी के गठबंधन की वजह से इस बार दलितों के मतों में बिखराव हुआ। कर्नाटक में मुसलमानों की संख्या पंद्रह फीसद है। पिछले चुनाव में इनका एकमुश्त वोट कांग्रेस को मिला था। लेकिन इस बार के चुनावी नतीजों से पता चलता है कि जेडीएस कमोबेश मुस्लिम मतदाताओं में सेंध लगाने में कामयाब रही। चुनावी नतीजों से एक बात तो स्पष्ट है कि इस साल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका फायदा मिलेगा। वहीं अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सांगठनिक क्षमता पर सवाल जरूर उठेंगे, क्योंकि चुनावी राजनीति में जीत के मायने होते हैं और उसी को याद रखा जाता है।

[वरिष्ठ पत्रकार] 

By Sanjay Pokhriyal