चंडीगढ़ [अनुराग अग्रवाल]। हरियाणा में चुनावी बिसात बिछ चुकी है। राजनीतिक दलों के योद्धा चुनावी रण में कूदने, एक-दूसरेे को चुनौती देने और जीत हार के लिए जूझने को पूरी तरह से तैयार हैं। कुछ दलों की तैयारी पूरी हो चुकी तो कुछ लंगोट कस रहे हैं। 14वीं विधानसभा के लिए होने वाले इस चुनाव में पांच बड़ी पार्टियां ताल ठोंक रही हैं। पांचवीं बार अपने खुद के बूते चुनाव लड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव की सबसे बड़ी प्लेयर है।

गुटों में बंटी कांग्रेस भाजपा को जरूर थोड़ी चुनौती देती नजर आ सकती है। चौटाला परिवार में हुए राजनीतिक बिखराव के बाद जननायक जनता पार्टी और इनेलो भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी तथा उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी इस बार के चुनाव में भले ही छोटे प्लेयर्स की भूमिका में हों, लेकिन कमतर बिल्कुल भी नहीं हैं।

हरियाणा के चुनावी रण में राजनीतिक दलों के अतीत, मौजूदा स्थिति और भविष्य को समझने के लिए हमें उनकी तह में जाना होगा। सबसे पहले चुनावी महासमर की सबसे बड़ी प्लेयर पार्टी भाजपा की बात करते हैं। हरियाणा के इतिहास में 2014 के चुनाव में पहला मौका था, जब भाजपा ने 47 विधायकों के साथ पूर्ण बहुमत वाली अपनी खुद की सरकार बनाई और दूसरे दलों की बैसाखियों को हमेशा के लिए छोड़ दिया। करनाल से पहली बार विधायक बने मनोहर लाल पहली बार में ही सूबे के मुख्यमंत्री बन गए।

पंजाब से अलग होने के बाद हरियाणा एक नवंबर 1966 को अस्तित्व में आया था। उस समय चुनाव नहीं हुआ। तब के बाद से अब यह 13वां चुनाव है और राजनीतिक दल 14वीं विधानसभा में प्रवेश करने की तैयारी में लगे हैं। भाजपा ने इस बार 75 से अधिक विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य यूं ही तय नहीं कर लिया गया। मोदी लहर हो या फिर मनोहर सरकार का कमाल, हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की सभी 10 सीटें जीतने के साथ ही 79 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की है।

90 सदस्यीय विधानसभा में इतनी सीटों पर बढ़त से पार्टी उत्साहित है और 75 बार का टारगेट फिक्स कर दिया। भाजपा ने पहला चुनाव खुद के बूते 1991 में लड़ा और मात्र दो विधायक प्रो. रामबिलास शर्मा व खैराती लाल शर्मा जीतकर आए। 2005 में भी भाजपा अकेले लड़ी, मगर दो विधायक नरेश मलिक और रामकुमार गौतम से आगे नहीं बढ़ पाई। 2009 में भाजपा अनिल विज, कविता जैन, कृष्णपाल गुर्जर और घनश्याम सर्राफ के रूप में चार विधायक जिताकर लाई। 2014 के चुनाव में पहला मौका था, जब भाजपा के 47 विधायक चुनकर आए और पार्टी ने राजनीतिक बैसाखियों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। अब 2019 यह पांचवां चुनाव है, जब भाजपा डबल जोश के साथ खुद के बूते ताल ठोंकने की तैयारी में हैं।

गठबंधन के दौर में नहीं उभर पाई भाजपा

1982 में लोकदल (इनेलो) और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा तथा भाजपा छह सीटें जीत पाई। 1996 में चौ. बंसीलाल की पार्टी हविपा व भाजपा ने हाथ पकड़डे तो भाजपा 11 सीटें जीत पाई, जबकि 2000 में इनेलो व भाजपा के गठबंधन में भाजपा छह सीटें जीतने में कामयाब रही। 2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अकेले लड़ी और सिर्फ दो जीते। 2009 के विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीतीं। 2014 में भाजपा ने सारे मिथक तोड़कर सत्ता हासिल की, उस समय भी भाजपा के 12 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी।

मोदी का फैक्टर भी चलेगा

हरियाणा भाजपा के चुनाव की खास बात यह है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ मनोहर लाल भी चेहरा हैं। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बार-बार मनोहर लाल को दूसरी बार के सीएम पद का प्रत्याशी घोषित कर चुके हैं। इस बार के चुनाव में मोदी फैक्टर तो काम करने वाला है ही, साथ ही पांच साल के मनोहर लाल के कामकाज के लिहाज से वह भी चुनाव में बड़ा असर डालने वाले हैं।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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