रायपुर। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में दबाव समूहों की राजनीति पर सबकी नजर है। दरअसल 15 सालों से सत्ता पर काबिज भाजपा को चुनाव के ऐन पहले तमाम संगठनों के दबाव से निपटना पड़ा। कुछ की मांगें सरकार ने पूरी की तो कुछ निराश हुए। आधी अधूरी मांग पूरी होने से कई समूह सरकार से मुंह फुलाए बैठे हैं। आदिवासियों ने तो अपनी अलग पार्टी ही बना ली है।

इधर, विपक्षी कांग्रेस को आचार संहिता लगने से पहले मुद्दे-पर-मुद्दे मिले। हर समूह की सभी जायज-नाजायज मांगों को कांग्रेस ने आंख मूंदकर समर्थन दिया। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि दबाव समूहों की राजनीति चुनाव में क्या असर छोड़ पाएगी?

किसके पाले में जाएंगे

राजनीतिक पंडितों की मानें तो दबाव समूह सरकार पर दबाव तो जरूर बनाते हैं, लेकिन चुनाव के वक्त उनकी एकता टूट जाती है। सरकार से नाराज समूह किसके पाले में जाएंगे यह इस बात से तय होता है कि समूह किसके ज्यादा नजदीक रहा है। यह भी देखा जाना चाहिए कि विपक्ष ऐसे नाराज समूहों को कैसे साधता है। यह सही है कि जितनी ज्यादा एंटी इंकम्बेंसी होगी दबाव समूह उतने ही सक्रिय होंगे।

सरकार जब दबाव में होती है तो आंदोलन पर नए-नए संगठन उतर आते हैं। इस बार तो अनुशासन से बंधी पुलिस भी आंदोलन की हिम्मत जुटा ले गई। यह चुनावी राजनीति का ही हिस्सा है इसीलिए सरकार को भी अधिकांश संगठनों की मांगों के आगे झुकना पड़ा। पहले कुछ मामलों में सख्ती दिखी लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते गए सरकार का रूख नरम होता गया।

दर्जनों दबाव समूह, एक सरकार

सरकार तो एक ही है जबकि इस बार दबाव समूह कई बन गए। किसान आंदोलन पर रहे। सरकारी कर्मचारी सातवें वेतनमान के एरियर्स और महंगाई भत्ते में वृद्धि मांगते रहे।

शिक्षाकर्मियों का संविलियन हुआ लेकिन जो बच गए वे नाराज हैं। आदिवासियों की जमीन के मुद्दे पर सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा जबकि इसके बाद शुरू हुआ आंदोलन आगे ही बढ़ता गया। अब तो आदिवासियों ने अलग पार्टी बनाकर चुनाव में उतरने का एलान भी कर दिया है, हालांकि उनके इस कदम को भी दबाव की राजनीति का ही हिस्सा माना जा रहा है। चुनाव के वक्त सवर्णों का समूह भी सड़क पर उतरता दिखा। इन सबका असर क्या होगा यह देखा जाना बाकी है।

Posted By: Prateek Kumar

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