जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। बिहार में छोटी पार्टियों के बडे़ सियासी निशाने साधने के दांव ने सत्ता की दौड़ में शामिल दोनों प्रमुख गठबंधनों की चुनावी चिंता बढ़ा दी है। एनडीए में जदयू जहां लोजपा के विरोधी तेवरों से परेशान है वहीं महागठबंधन भी लोजपा के साथ रालोसपा की अगुआई वाले गठबंधन से लेकर पप्पू यादव की जनाधिकार पार्टी सरीखे छोटे दलों की 'वोट कटवा' क्षमता से चिंतित है। विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी मतों के बंटवारे की छोटे दलों के सियासी खेल की सिरदर्दी से बचने के लिए राजद और कांग्रेस ने चुनाव अभियान में इस पर आक्रामक रणनीति अपनाने का फैसला किया है।

सूबे में सभी दलों के उम्मीदवारों के मैदान में आने के साथ ही चुनावी अभियान ने पूरा जोर पकड़ लिया है। इसी आधार पर तमाम पार्टियां सूबे की चुनावी दिशा-दशा का आकलन और अनुमान लगा रही हैं। बिहार में महागठबंधन की चुनावी रणनीति का संचालन कर रहे कांग्रेस के एक वरिष्ठ रणनीतिकार के अनुसार जमीनी आकलन से साफ है कि एनडीए के दावों के उलट चुनाव कांटे का है। इस परिस्थिति में 15 साल के सत्ता विरोधी मिजाज का फायदा महागठबंधन को मिलेगा। लेकिन छोटी पार्टियों के बड़ी पार्टियों के टिकट से वंचित प्रभावशाली चेहरों को कई जगह उम्मीदवार बनाने से चुनाव त्रिकोणीय बनता दिख रहा है।

लोजपा से जदयू ही नहीं महागठबंधन भी हो रहा परेशान

कांग्रेस-राजद का आकलन है कि जिन सीटों पर चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होगा वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 साल की सत्ता से खफा मतों का बंटवारा होगा। इस लिहाज से लोजपा को भी महागठबंधन कई सीटों पर अपने लिए सिरदर्द मान रहा है। महागठबंधन ने अपने अंदरूनी सर्वे के आधार पर अनुमान लगाया है कि बेशक लोजपा के उम्मीदवार जदयू को ज्यादा नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हैं लेकिन जातीय और सामाजिक समीकरणों के चलते वे कई सीटों पर कांग्रेस या राजद की संभावनाओं को पलीता भी लगा सकते हैं। इसीलिए महागठबंधन ने छोटे दलों पर सीधा हमला कर उनकी सियासी साख को ध्वस्त करने की रणनीति अपनाने का फैसला किया है। राजद नेता महागठबंधन के सीएम उम्मीदवार तेजस्वी यादव इसी रणनीति के तहत रविवार और सोमवार को अपनी चुनावी सभाओं में नाम लिए बिना लोजपा समेत छोटी पार्टियों को वोट कटवा बताते हुए मतदाताओं को सतर्क करते दिखे।

ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्यूलर फ्रंट से महागठबंधन चिंतित

रालोसपा की अगुआई में बनी ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्यूलर फ्रंट में शामिल बसपा और एआइएमआइएम जैसी पार्टियां भी महागठबंधन की चिंता का कारण है। एआइएमआइएम के प्रमुख असद्दुदीन ओवैसी सीमांचाल में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। सीमांचल पहले से ही राजद और कांग्रेस के मजबूत आधार वाला इलाका रहा है। रालोसपा का भी ओबीसी विशेषकर कुशवाहा समाज में अपना प्रभाव है और जहां चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होगा ऐसे समीकरण सीटों की हार-जीत में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

 

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