नीलू रंजन, गुवाहाटी। असम के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सीएए यानी नागरिकता कानून को ही सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। बार बार दोहराया जा रहा है कि उसकी सरकार बनी तो वह इसे लागू नहीं होने देगी। वहीं कांग्रेस की ओर से उसे मुद्दा बनाए जाने पर अचरज भी जताया जा रहा है। दरअसल असम के एक बड़े हिस्से में जनता इस मुद्दे के प्रति उदासीन होने लगी है। वहीं कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं, जहां सीएए को लेकर लोगों ने आस लगा रखी है। यानी कहीं ऐसा न हो कि जिस मुद्दे पर सवार होकर कांग्रेस सरकार में आना चाहती है वह मुद्दा ही फुस्स हो जाए।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों के केंद्र रहे अपर असम में दिख रही उदासीनता

गुवाहाटी के अशोक कोलिता के अनुसार, एक साल पहले सीएए असम के लोगों के लिए बड़ा मुद्दा था। सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में लाखों लोग जमा हो जाते थे। खासतौर पर अपर असम में कई जगह हिंसक प्रदर्शन हुए थे। उस समय लोगों को लग रहा था कि सीएए के बाद बड़ी संख्या में बांग्लादेशी हिंदू असम आ जाएंगे और उन्हें नागरिकता भी मिल जाएगी। पिछले कई दशकों से घुसपैठ का दंश झेल रहे असम के लोगों की आशंका को आधारहीन भी नहीं कहा जा सकता है। एक साल के भीतर सीएए पर कोई चर्चा तक करने को तैयार नहीं है।

चुनाव में सीएए लोगों के लिए कोई मुद्दा नहीं

दरअसल धीरे-धीरे लोगों को यह अहसास हो गया है कि सीएए बांग्लादेश से आए नए हिंदुओं पर लागू होगा ही नहीं और पहले से रह रहे हिंदुओं को नागरिकता मिलने से उनके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अपर असम को शिवसागर के रहने वाले निरंजन गोगोई कहते हैं कि सीएए हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं है और हमारे जैसे सामान्य आदमी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

कांग्रेस नहीं दिख रहा है कोई फायदा

शिवसागर जिले के जमीनी स्तर पर काम करने वाले कांग्रेस के एक कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं कि जनता के बीच सीएए चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है। वहीं असम के बोडो इलाके पहले से सीएए से सुरक्षित हैं, यहां सीएए लागू ही नहीं होगा। जाहिर है आम जनता के लिए गौण हो चुके सीएए को चुनावी मुद्दा बनाने से कांग्रेस को फायदा होता नहीं दिख रहा है।

बराक घाटी में कांग्रेस को नुकसान होने के दिख रहे आसार

अपर असम और बोडो इलाके में जहां सीएए कोई मुद्दा नहीं है, वहीं बराक घाटी में यह मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ जा सकता है। बराक घाटी में सबसे अधिक बांग्लादेश से आए बांग्लाभाषी रहते हैं, जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों हैं। सीएए से बांग्लादेश से आए हिंदुओं को फायदा होगा और उन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी, वहीं बांग्लादेश से आए मुसलमानों को सीएए के बाद एनआरसी का सामना करना पड़ेगा।

कांग्रेस के चुनावी साझेदार बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ का मुख्य जनाधार बराक घाटी में बांग्लादेशी मुसलमानों के बीच में ही है। बराक घाटी से आनेवाली कांग्रेस की वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद सुष्मिता देव की समझौते को लेकर नाराजगी जगजाहिर हो चुकी है। एक कार्यक्रम में तो उन्होंने सीएए विरोधी पट्टा भी हटा दिया था।

Edited By: Arun Kumar Singh