[ अवधेश कुमार ]: उच्चतम न्यायालय 40 दिनों की सुनवाई के बाद अब फैसला देने की ओर बढ़ गया है। फैसला जो भी हो, लेकिन इस दौरान हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्षों की ओर से जिस तरह की गंभीर बहस हुई और जो साक्ष्य दिए गए वह उच्चतम न्यायालय के इतिहास का महत्वूपर्ण अध्याय बन गया है। इतिहास, पुरातत्व, धार्मिक पुस्तकों, यात्रियों के विवरणों, पूर्व के मुकदमों में दिए गए गवाहों के विवरण इस बात के सुबूत हैैं कि दोनों पक्षों ने काफी परिश्रम किया है। फैसला आ जाने के बाद केवल रामजन्म भूमि बाबरी विवाद ही नहीं, भारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास तथा धार्मिक और सांस्कृतिक स्थिति पर अध्ययन की प्रचुर सामग्री एक ही जगह मिल जाएगी। आइए दोनों पक्षों की ओर से दी गई दलीलों के कुछ अंशों को देखें।

भगवान राम की जन्मस्थली पर मुस्लिम दावा नहीं कर सकते

हिंदू पक्षों ने तर्क दिया कि भगवान राम की जन्मस्थली अपने आप में देवता है और मुस्लिम 2.77 एकड़ विवादित जमीन पर अधिकार होने का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि संपत्ति को बांटना ईश्वर को नष्ट करने और उसका भंजन करने के समान होगा। वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि अकबर और जहांगीर के समय में भारत आने वालों में विलियम फिंच और विलियम हॉकिंस ने अपने लेखों में अयोध्या का भी जिक्र किया है।

जिस जगह मस्जिद बनाई गई थी उसके नीचे मंदिर का बहुत बड़ा ढांचा था

उन्होंने दलील दी कि पुराण और अलग-अलग समय के ब्रिटिश रिकॉर्ड राम और अयोध्या के बीच संबंधों की पुष्टि करते हैं और यह भी बताते हैं कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई। ब्रिटिश सर्वेयर एम. मार्टिन और जोसेफ टिफेंथलर ने भी कहा था कि लोगों का विश्वास था कि अयोध्या राम की जन्मस्थली है। हिंदू पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि जिस जगह मस्जिद बनाई गई थी उसके नीचे मंदिर का बहुत बड़ा ढांचा था। उसमें कई पिलर और स्तंभ हैं जो ईसा पूर्व 200 साल पहले के हैं। खोदाई में जो खंभे मिले थे उसमें राम के बाल स्वरूप, शिव तांडव और भगवान कृष्ण की भी तस्वीरें हैैं। कहा गया कि मौके से 12वीं शताब्दी के शिलापट्ट और शिलालेख मिले हैं, उनके मुताबिक वहां भगवान विष्णु का विशाल मंदिर था। मस्जिद बनाए जाने के बाद भी हिंदू वहां पूजा करते थे।

मुस्लिम किसी भी मस्जिद में नमाज पढ़ सकते हैं

निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील कुमार जैन ने 1934 के गवाह राजा राम पांडेय का बयान पढ़ा जिसमें उन्होंने रामलला और उनके लकड़ी के सिंहासन को देखने की बात कही थी। सरकार ने जब 1990 में धार्मिक स्थान की पहचान की थी तब अयोध्या के जन्मस्थान पर बना मंदिर भी उसमें शामिल था। वाद का पहला कारण 1855 में सामने आया था जब एक दंगा भड़का था। जिसके बाद मुसलमानों ने इस जगह पर कब्जा ले लिया और कुछ समय पश्चात हिंदुओं का कब्जा हो गया। अधिवक्ता के. परासरन ने कहा कि सभी मस्जिद बराबर मानी जाती हैं। अयोध्या में 55-60 मस्जिदें हैं। मुस्लिम किसी भी मस्जिद में नमाज पढ़ सकते हैं, लेकिन हिंदुओं के लिए राम का जन्मस्थान एक ही है। सड़कों पर भी नमाज पढ़ी जाती है, इसका मतलब यह नहीं है कि वे मस्जिद हो जाएंगी और उनको मालिकाना हक मिल जाएगा।

बाबर कभी अयोध्या नहीं आया

अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि बाबर कभी अयोध्या नहीं आया और उसने मस्जिद का निर्माण नहीं कराया। मीर बकी नाम का भी कोई शख्स नहीं था। बाबरनामा में कहीं भी उसका जिक्र नहीं है।

औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई

दरअसल औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई। निकोलो औरंगजेब का कमांडर था। निकोलो के रिकॉर्ड बताते हैं कि औरंगजेब ने चार विख्यात हिंदू मंदिरों को तोड़ा था। आईन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने रामकोट का जिक्र किया है। हुमायूंनामा दूसरा दस्तावेज है। बाबर की बेटी गुलबदन बेगम ने इसे लिखा था। उसमें भी किसी मस्जिद का वहां जिक्र नहीं है। तीसरा दस्तावेज तुजुक-ए-जहांगीरी है जिसमें भी कोई मस्जिद का जिक्र नहीं है। उन्होंने कहा कि जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने उस जगह पर खोदाई कार्य की तो स्तंभों की सात पंक्तियां दिखाई दीं और हिंदू परंपराओं के अनुसार कुल 85 स्तंभ (पिलर) वहां थे।

जन्मस्थान की दलील विश्वास और आस्था पर आधारित है 

अब आएं मुस्लिम पक्ष की ओर। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि वैधानिक बेंच को दो पहलुओं को देखना है। पहला, विवादित स्थान पर मालिकाना हक किसका बनता है? और दूसरा कि क्या गलत कानून जारी रखा जा सकता है? बाबरी के अंदर देवी-देवताओं की प्रतिमा का प्रकट होना चमत्कार नहीं था। 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को सुनियोजित तरीके से हमला किया गया, गुंबद के नीचे मूर्ति रख दी गई। फैजाबाद के तत्कालीन उपायुक्त केके नायर ने स्पष्ट निर्देश के बावजूद मूर्तियों को हटाने की इजाजत नहीं दी। जन्मस्थान की दलील विश्वास और आस्था पर आधारित है और अगर इस दलील को स्वीकार कर लिया गया तो इसका व्यापक असर होगा।

अभिलेखों से साफ है कि मस्जिद बाबर ने बनवाई थी

सभी मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई कि 1934 के बाद भी बाबरी में नमाज पढ़ी गई थी। 1934 में मस्जिद पर हमले के बाद पीडब्ल्यूडी दस्तावेज में इस बात के साक्ष्य मौजूद हैं कि मस्जिद की मरम्मत की गई थी। अभिलेखों से साफ है कि मस्जिद बाबर ने बनवाई थी। जफरयाब जिलानी ने दलील दी कि 1855 से पहले वहां कुछ नहीं था। उनकी दलील थी कि मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनवाई गई, बल्कि खाली जगह पर बनवाई गई।

मालिकाना हक कभी निर्मोही अखाड़ा के पास नहीं था

संविधान पीठ ने कहा कि लोहे की ग्रिल लगाने का मकसद बाहरी बरामदे से भीतरी बरामदे को अलग करना था। राजीव धवन ने कहा कि 1949 के केस के बाद किसी गवाह के बयान से जाहिर नहीं होता कि रेलिंग के पास लोग पूजा के लिए क्यों जाते थे? निर्मोही अखाड़ा के दावे पर कि वह बाहरी आंगन में राम चबूतरे पर 1855 से पूजा करता था धवन ने कहा कि राम चबूतरे पर पूजा और पूजा के अधिकार को हमने कभी मना नहीं किया, लेकिन वहां का मालिकाना हक कभी निर्मोही अखाड़ा के पास नहीं था, बल्कि हमारे पास था।

हिंदुओं ने 1934 में बाबरी मस्जिद पर हमला किया

हिंदुओं ने 1934 में बाबरी मस्जिद पर हमला किया। फिर 1949 में अवैध घुसपैठ की और 1992 में इसे तोड़ दिया। अब कह रहे हैं कि संबंधित जमीन पर उनके अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए। कानूनी मामलों में ऐतिहासिक बातों और तथ्यों पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।

अयोध्या फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय पर टिकीं देश की नजरें

कुल मिलाकर अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट किस पक्ष की दलीलों को सही मानकर फैसला सुनाता है। देश की नजरें सर्वोच्च न्यायालय की ओर लगी हुई हैैं।

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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