[ चिराग जैन ]: विपत्ति मनुष्य को उसकी लापरवाही पर ध्यान देने का अवसर देती है। हमेशा समय की कमी का रोना रोने वाला मानव आज पूरी तरह फुरसत में है। उसकी दुकान बंद है, लेकिन उसे कोई बेचैनी इसलिए नहीं है कि उसके ग्राहक का कहीं और जाने का भय नहीं है। उसकी फैक्ट्री बंद है, लेकिन वह इससे संतुष्ट है कि उसके प्रतिद्वंद्वी की भी फैक्ट्री बंद है। फैक्ट्री ही क्या पूरा बाजार बंद है। बाजार ही क्या पूरा शहर बंद है। शहर ही क्या पूरा देश बंद है। अपना देश ही क्या, कई और देश भी बंद है।

महामारी मंदिर के फर्श से लेकर मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद

आज जितनी फुरसत कभी किसी पीढ़ी के मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुई है। जब इस फुरसत में बोरियत से बचने के समस्त उपायों से बोर हो जाएंगे तब दुनिया पलट कर देखेगी कि जिन कार्यों में हम अब तक इतने व्यस्त थे वे सब तो इस संकट में हमारी सहायता कर ही नहीं पा रहे थे। हम युद्ध की तैयारियों के लिए अस्त्र-शस्त्र बना रहे थे, लेकिन फिलहाल उनकी कोई सुधि ही नहीं ले रहा है। हम अपने थोथे अहंकार की पुष्टि के लिए समाज को ऊंची-नीची जातियों या हिंदू-मुस्लिम में बांट रहे थे, लेकिन महामारी का यह रक्तबीज तो किसी को नहीं बख्श रहा है। यह महामारी मंदिर के फर्श से लेकर मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद है।

जिनके पास नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में खुद झाड़ू-पोंछा कर रहे

हम अनाप-शनाप पूंजी बना रहे थे, लेकिन आज हमारे पास उस पूंजी को खर्च करने का उपाय नहीं है। जो एक बड़ा भूखंड जीतकर चक्रवर्ती बने फिरते थे, वे आज दो कमरों के फ्लैट में बंद हैं। जिनके पास हर काम के लिए नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में खुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं। कितना आश्चर्य है कि सुख के समय में हम अमीर-गरीब हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-अछूत, शहरी-ग्रामीण, साक्षर-निरक्षर, स्त्री-पुरुष और न जाने क्या-क्या संज्ञाएं ओढ़े फिरते हैं, लेकिन दुख आते ही हम सब खालिस मनुष्य हो जाते हैं।

देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन अवश्य हों

दो-दो महायुद्ध झेलने के बाद यूरोप ने यह सबक लिया कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किसी भी सरकार का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। सत्ता और वर्चस्व की होड़ में विनाश के भयावह दृश्य देख लेने के बाद यूरोप के देशों ने अपनी सीमाओं पर खर्च होने वाले धन का अधिकतम अंश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर लगाना शुरू किया। कोरोना के विरुद्ध जारी इस महायुद्ध के समय हम यह संकल्प तो ले ही सकते हैं कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन अवश्य हों।

राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोने वाला परिवार स्वस्थ्य हो

राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सभी दल जब वर्चस्व की लड़ाई लड़ें तो उसका बोझ उस बजट पर न पड़े जो जनता के अस्तित्व की रक्षा के लिए निर्धारित हो। अस्त्र खरीदे भी जाएं और बनाए भी जाएं, लेकिन उनकी खरीद के लिए किसी अस्पताल या किसी स्कूल का बजट एडजस्ट न किया जाए। हमारा राष्ट्रीय ध्वज मंगल पर भी फहराए और चांद पर भी, लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोने वाला कोई परिवार फाके तो नहीं कर रहा। 

सरकार यूनिक आईडी से दिहाड़ी मजदूरों को चिन्हित कर उनके खाते में धन भेजकर परेशानी से बचती

हमारी प्राथमिकताएं क्या हों, यह हमें वर्तमान समय चीख-चीखकर बता रहा है। हमें इसे सुनना ही होगा। पीछे पलट कर किसी से शिकायत करने की संभावना शेष नहीं है। अशोक जब कलिंग के बाद संन्यास पथ पर चले होंगे तब उन्होंने अपने वर्तमान को देखकर ही निर्णय लिया होगा। यदि वह अतीत से उलझते तो अतीत उन्हें कभी भविष्य सुधारने की मोहलत नहीं देता। वर्तमान को परिवर्तन का कलिंग युद्ध मानकर एक शांत और सुखद भविष्य की ओर कदम बढ़ाने पर सोचा जाना चाहिए। वर्तमान हमें बता रहा है कि लॉकडाउन की इस परिस्थिति में हमारे पास एक ऐसा पुख्ता तंत्र होना चाहिए था कि सरकार सबकी यूनिक आईडी के माध्यम से चिन्हित कर पाती कि एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों में से कितने ऐसे हैं जिनके व्यवसाय के कॉलम में दिहाड़ी मजदूर लिखा है। यूनिक आईडी के माध्यम से सरकार उन सभी परिवारों की पहचान आसानी से कर लेती और उनके खाते में आवश्यक राशि पहुंचाकर उन्हें मुसीबत से बचा लेती।

नागरिक बोध विकसित करने की शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए

वर्तमान चीख-चीख कर कह रहा है कि हमारे पास न्यूनतम शिक्षा के साथ-साथ सिविक सेंस यानी नागरिक बोध विकसित करने की भी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि सरकार को जनता की भलाई के लिए उस पर लाठियां न भांजनी पड़ें।

संकट की घड़ी में महामारी, प्रदूषण, रोग के उपचार में बाधा नहीं आना चाहिए

वर्तमान चीख-चीख कर कह रहा है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं के पास इतनी व्यवस्था अवश्य हो कि यदि किसी संकट की घड़ी में पांच प्रतिशत जनसंख्या किसी महामारी, प्रदूषण, रोग, युद्ध आदि से प्रभावित हो जाए तो उसके उपचार में बाधा न आए।

सरकार ही पूरी बस्ती की आग बुझाने का प्रयास करती है

वर्तमान यह भी कह रहा है कि सरकार के पास ऐसे अधिकार हों कि ऐसी आपदा के समय निजी कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में लेकर जनहित में प्रयोग कर सके। ध्यान रहे कि जब बस्ती में आग लगती है तब व्यापारी केवल अपनी दुकान बचाता है और जैसे ही उसकी दुकान सुरक्षित होती है तो वह पानी की बाल्टियां बेचकर बस्ती में धंधा करने लगता है। राजनीतिक दल उस समय आग बुझाने का दिखावा करते हैं ताकि चुनाव के समय बस्ती में वोट मांगने का अधिकार मिल सके। केवल सरकार ही है जो पूरी बस्ती की आग बुझाने के लिए प्रयास करती है।

घरों से बाहर निकले तो यह ‘बंदी’ मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी

यह भीषण समय बीतने के बाद यदि हम अपनी मानवता को बलिष्ठ करके घरों से बाहर निकले तो यह ‘बंदी’ मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी, लेकिन इसके बीतते ही यदि हम फिर से ‘मनुष्य’ के बजाय कोई भी अन्य संज्ञा लपेट बैठे तो कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई में शहीद हुए लोगों के बलिदान और हफ्तों तक घरों में बंद रहकर झेल रहे देश की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।

( लेखक साहित्यकार हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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