हिमाचल प्रदेश, नवनीत शर्मा। Coronavirus: कांगड़ा जिले के धमेटा की महिला दर्जी हो या नूरपुर के राजू... मास्क बना रहे हैं इन दिनों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस वातावरण में जब कोई प्राणवायु ले तो वह कुख्यात वायरस दूर रहे। वायरस, जिसने चीन, इटली और कई देशों के बाद अंतत: भारत पर भी असर दिखाना शुरू किया है। आपातस्थिति से निपटने के लिए पूरे देश के साथ हिमाचल प्रदेश भी जूझ रहा है।

पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा से पूर्व ही हिमाचल बंद हो चुका था। इस वातावरण में बुधवार को प्रदेश के सभी सांसदों ने करीब सवा दो करोड़ रुपये कोरोना के साथ जूझने के लिए समर्पित किए। इससे पूर्व परिवहन विभाग के कर्मचारी हों या खंड विकास अधिकारी संघ हो...अन्य संस्थाएं अपना-अपना योगदान किसी न किसी रूप में दे रही हैं। दरअसल आपदाकाल में परखा जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है धीरज।

धीरज के अभाव में ही अफवाहें अपना रास्ता बनाती हैं और अचानक सैनिटाइजर और मास्क जैसी वस्तुएं लुप्त होने लगती हैं। अगर कालाबाजारी करने वाले हाथ एक पक्ष का पता देते हैं तो इस सबसे निपटने के लिए उठे तमाम हाथ उस भारत की प्रकृति हैं जो आपदा में भी साहस बुन लेते हैं। नूरपुर के राजू जैसे लोग जब मास्क बना रहे थे तो जाहिर है वे उस दीये की तरह अपना कर्तव्य निभा रहे थे, जो सूरज का विकल्प नहीं होता मगर रोशनी उसका धर्म है। हिमाचल में कोरोना वायरस के तीन मामले आए हैं। अमेरिका से लौटे तिब्बती की मौत हो चुकी है, जबकि दो उपचाराधीन हैं।

हिमाचल के समाज की यह विसंगति बेहद अजीब है कि एक तरफ लोग मास्क सिल रहे हैं, पालमपुर स्थित हिमालयन जैव संपदा एवं प्रौद्योगिकी संस्थान सस्ता और गुणवत्ता वाला सैनिटाइजर बना रहे हैं, वहीं कुछ लोग जो ‘पैनिक बाइंग’ के शिकार हैं, यहां तक झूठ बालने में माहिर हैं कि उन्हें यात्रा वृतांत बताने में भी शर्म महसूस होती रही। कुछ लोगों ने स्वयं कहा कि वे विदेश से आए हैं, उनकी जांच की जाए। लेकिन कुछ लोग इतने अति आत्मविश्वासी निकले कि लोगों से शिकायतें मिलने पर प्रशासन को उन्हें उठाना पड़ा। एक सरकारी स्कूल की प्रधानाचार्य हैं जिन्हें यह उचित नहीं लगा कि वह जांच करवाएं। लोगों को सब पता था और जब शिकायत हुई तो आराम से समझाने पर भी वह नहीं मानीं और स्कूल जाती रहीं। अंतत: प्रशासन ने जब सख्त रवैया अपनाया तो उन्हें समझ आया।

सरकार जंजीर तोड़ना चाहती है, लेकिन यही लोग जंजीर को कड़ी दर कड़ी बांधना चाहते हैं। आम आदमी और खास आदमी में यही अंतर है। आम आदमी प्रधानमंत्री के कहने पर जनता कफ्र्यू का हिस्सा बनता है और शाम को थाली या घंटी भी बजाता है, वातावरण में सकारात्मकता भरता है। और खास आदमी ट्रैवल हिस्ट्री छिपाता है, सबको खतरे में डालता है, किसी के पास चाय पीता है, किसी से गले मिलता है। इस बीच कई पक्षों से यह शिकायत आती रही है कि अस्पतालों में भी मास्क और सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं हैं। हो तो यह भी सकता था कि जिस बजट को प्रदेश सरकार ने पारित किया, उसमें संशोधन करते हुए सभी क्षेत्रों का कुछकुछ बजट काटते हुए कोरोना के लिए रखा जाता। अब सांसदों और अन्य पक्षों की पहल से लड़ाई को आसान करने का प्रयास रहेगा, ऐसा दिख रहा है।

हर अभूतपूर्व स्थिति अपने साथ चुनौती लाती है। वास्तव में उसी चुनौती में अवसर भी निहित होते हैं। 21 दिन घर बैठना जिन्हें मुश्किल लग रहा है, उन्हें यह अवश्य सोचना चाहिए कि जीवन से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। ये दिन संभवत: आत्मसाक्षात्कार के दिन हैं, अपनों को और अपने आप को समझने के दिन हैं। यह जीवन के उन तमाम पक्षों को जानने- बूझने के दिन हैं जिन्हें अन्यथा जीवन की आपाधापी में छोड़ दिया जाता है। यह समय एक-दूसरे के साथ न होकर भी एक-दूसरे के साथ होने का है। ये तीन सप्ताह अगर धैर्य के साथ सकारात्मकता का प्रचार-प्रसार करते हुए काट लिए जाएं तो यह स्वयं की ही मदद होगी।

यह उन लोगों की मदद भी होगी, जो स्वयं को खतरे में डाल कर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि बाकी लोग घरों में रह सकें। कफ्र्यू के कुछ कायदे होते हैं। और यह स्थिति स्वास्थ्य से जुड़ी है इसलिए आवश्यक है कि इसका पालन किया जाए। 18 घंटे में हिमाचल में 82 मामले उल्लंघन के आना ठीक बात नहीं है। खासतौर पर तब, जब आवश्यक वस्तुओं के लिए समय निर्धारित है। यह और बात है कि वहां भी लोगों को उचित दूरी में रहना चाहिए। आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों की दिक्कतों का ध्यान रखना अधिकारियों का काम है। क्योंकि यह जंग नहीं है, अपितु स्वास्थ्य आपातकाल है, इसलिए हिमाचल सरकार को खासतौर पर ध्यान देना होगा कि मास्क और सैनिटाइजर वही लोग बनाएं जो इसके लिए अधिकृत हैं। उन कड़ियों का पता भी लगाएं जो निर्माण की लागत 25 रुपये और बेचने की कीमत 160 या 200 रुपये बताती हैं। यह समय हौसले का समय है। ठानने का समय है, क्योंकि हमें जीतना है। शकील आजमी ने यूं ही नहीं कहा : ‘हार हो जाती है जब मान लिया जाता है, जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है।।’

[राज्य संपादक, हिमाचल प्रदेश]

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