[ मनीष सिसोदिया ]: यह जानकर खुशी हुई कि कोरोना संकट की वजह से दो महीने से ज्यादा समय से बंद पड़े स्कूलों को मानव संसाधन विकास मंत्रालय पुन: खोलने के लिए दिशानिर्देश बना रहा है। इस अवसर पर मैं दिल्ली के शिक्षा मंत्री के रूप में ही नहीं, बल्कि एक अभिभावक और देश के एक जागरूक नागरिक होने के नाते केंद्रीय मानव संसाधन विकास डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी का ध्यान कुछ बिंदुओं की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा। ये स्कूलों को फिर से खोलने से भी संबंधित हैं और वर्तमान परिवेश में स्कूली शिक्षा में व्यापक सुधार से भी।

स्कूलों को एक बड़ी और साहसिक भूमिका के लिए तैयार करना है

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कुछ समय पहले कहा था कि हमें कोरोना के साथ जीने का अभ्यास और आदत विकसित करनी होगी। ऐसे में स्कूलों को उचित सुरक्षा उपायों के साथ खोलना ही बेहतर कदम होगा। एक तरफ जहां यह बात सच है कि कोरोना वायरस से उपजी महामारी कोविड-19 ने समूची मानवता के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है वहीं मुझे लगता है कि इसने हमें यह एक अनूठा अवसर भी दिया है कि हम स्कूलों की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करें। अगर हमने अपने स्कूलों पर विश्वास करते हुए उन्हेंं नए दौर में एक बड़ी और साहसिक भूमिका के लिए तैयार नहीं किया तो हम एक ऐतिहासिक भूल करेंगे।

आने वाले समय में स्कूलों की भूमिका बच्चों को बेहतर और जिम्मेदार बनाने के लिए होगी

मेरी राय में आने वाले समय में स्कूलों की भूमिका बच्चों को सिर्फ कुछ पाठ पढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन्हेंं बेहतर और जिम्मेदार जीवन जीने के लिए तैयार करने की होगी। इस संबंध में मेरे कुछ सुझाव हैं। सबसे पहले तो हमें हर उम्र और हर वर्ग के बच्चे को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह हमारे लिए महत्वपूर्ण है और स्कूल के भौतिक और बौद्धिक परिवेश पर उसका समान अधिकार है। हमें इस विचार को पूरी तरह से किनारे करना होगा कि केवल ऑनलाइन क्लास से या केवल बड़े बच्चों को स्कूल में बुलाकर और छोटे बच्चों को अभी घर में ही रखकर शिक्षा को आगे बढ़ा सकेंगे। एक बच्चे के लिए हर उम्र में सीखने का काम बहुत महत्वपूर्ण होता है, भले ही वह बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हो या अभी पढ़ना-लिखना सीख रहा हो।

यदि कोरोना के साथ जीना सीखना है तो  स्कूल से बेहतर जगह और कोई नहीं हो सकती

अगर हमें कोरोना के साथ जीना सीखना है तो इसके लिए भी स्कूल से बेहतर जगह और कोई नहीं हो सकती। अब तक के अध्ययनों से यह पता चलता है कि अगर स्कूल में फिजिकल डिस्टेंसिंग और पर्याप्त निरीक्षण की व्यवस्था हो तो छोटी उम्र के बच्चों के लिए कोरोना वायरस का जोखिम बड़ी उम्र के बच्चों से ज्यादा नहीं होगा। बच्चों को स्कूल बुलाने से पहले अभिभावकों को भी इन तथ्यों से अवगत कराते हुए उन्हें विश्वास में लेना जरूरी है।

शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए हमें 3 से 14 वर्ष की उम्र में सीखने की बुनियादी क्षमता विकसित करने पर जोर देना चाहिए ताकि बच्चा अपनी इस क्षमता के आधार पर जीवनपर्यंत सीखते समझते हुए अपना जीवन बेहतर ढंग से जी सके। इस दौरान हमें बच्चे के अंदर हैप्पीनेस माइंडसेट और जिम्मेदारी से व्यवहार करने के गुण पर भी जोर देना चाहिए।

विद्यार्थियों को रटंत-परीक्षा के चंगुल से मुक्त कराया जाना चाहिए

सेकेंडरी, सीनियर सेकेंडरी ग्रेड की शिक्षा में बदलाव के लिए मेरा सुझाव है कि देश के विद्यार्थी जीवन को सिलेबस आधारित रटंत-परीक्षा के चंगुल से मुक्त कराया जाए। एनसीईआरटी को चाहिए कि वह सिलेबस में कम से कम 30 प्रतिशत की कमी तुरंत करे। इसी तरह सीबीएसई द्वारा दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं को वर्ष के अंत में एक बड़ी परीक्षा के मॉडल से निकालकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे बच्चा जब चाहे अपनी परीक्षा ऑनलाइन माध्यम से दे सके। इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि जब तक हमारे शिक्षक नए दौर की शिक्षा और परीक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होंगे तब तक शिक्षा के क्षेत्र में कोई आधारभूत परिवर्तन नहीं होगा।

हमें अपने शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण से रूबरू कराना होगा

हमें अपने शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण के साथ-साथ दुनिया में हो रहे आधुनिक प्रयोगों से भी रूबरू कराना होगा। शिक्षकों की ट्रेनिंग के अलावा रिसर्च पर भी जोर देना होगा ताकि सीखने, सिखाने के नए तौर-तरीके स्कूलों के स्तर पर लागू किए जा सकें। टीचर ट्रेनिंग के लिए जहां हम सिंगापुर मॉडल से कुछ सीख सकते हैं वहीं परीक्षा के लिए आइबी बोर्ड के तरीकों पर गौर किया जा सकता है। इस तरह एक नया ढांचा तैयार कर हमें स्कूलों की भूमिका पुन: निर्धारित करनी चाहिए।

कोरोना के साथ जीने के अभ्यास में दुनिया भर के स्कूलों में होंगे बड़े बदलाव

कोरोना के साथ जीने के अभ्यास में दुनिया भर के स्कूलों में बड़े बदलाव होंगे। ऐसे में हमें भी यह तय करना चाहिए कि हम खुद अपने देश और अपने समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए और अपने समृद्ध इतिहास से सीखते हुए अपने स्कूलों का पुर्निनर्माण करेंगे या फिर इसका इंतजार करेंगे कि कोई और देश या समाज कुछ कर ले और उसके बाद हम उसे अपने यहां ज्यों का त्यों लागू करने की या फिर उससे कुछ सीखने की कोशिश करेंगे? मेरी राय में हमें आज ही कदम उठाने चाहिए।

स्कूलों को अपने समाज के केंद्र बिंदु के रूप में स्थापित करें

वास्तव में अब समय आ गया है कि हम स्कूलों को अपने समाज के केंद्र बिंदु के रूप में स्थापित करें। मैं जानता हूं कि यह आसान नहीं है, लेकिन बच्चों की तरह ही हमारी शिक्षा व्यवस्था को, शिक्षा में लगे व्यवस्थापकों को और स्कूलों को भी सीखने, आगे बढ़ने और जिम्मेदार बनने की जरूरत है। मुझे उम्मीद है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मेरे सुझावों पर विचार करेंगे और हम सब मिलकर अपनी भावी पीढ़ी को आज से बेहतर, सक्षम और नई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार स्कूल उपलब्ध करा सकेंगे।

( लेखक दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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