[ संजय गुप्त ]: नए कृषि कानूनों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों ने जैसा रवैया अपना लिया है वह इसलिए विचित्र है, क्योंकि पहले यही दल उसी तरह के सुधारों की मांग किया करते थे जैसे इन कानूनों में किए गए हैं। इन कानूनों के विरोध में किसानों को उकसा-भड़का रहे राजनीतिक दल केवल कृषि सुधारों की बात ही नहीं करते थे, बल्कि उन्हें अपने घोषणापत्र का हिस्सा भी बनाते थे। कांग्रेस इससे मुंह नहीं मोड़ सकती कि पिछले लोकसभा चुनावों के लिए जारी अपने घोषणापत्र में उसने यह लिखा था कि अगर उसकी सरकार बनती है तो कृषि उपज विपणन समिति कानून यानी एपीएमसी एक्ट को वापस लिया जाएगा, कृषि उपज के व्यापार को बढ़ावा दिया जाएगा और यह हर तरह की पाबंदियों से मुक्त होगा। इसके पहले पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में मंडी व्यवस्था को सुदृढ़ करने और निजी निवेश को बढ़ावा देने की बात की थी। ऐसी ही बात आम आदमी पार्टी ने भी कही थी। इस पार्टी ने भी पंजाब में विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से वादा किया था कि एपीएमसी एक्ट में इस ढंग से संशोधन किया जाएगा कि किसानों को अपनी उपज राज्य के भीतर और बाहर कहीं भी बेचने का अवसर मिले। इसके साथ ही उसकी ओर से कृषि में बड़े पैमाने पर निजी निवेश की भी वकालत की गई थी।

नए कृषि कानूनों को लेकर संकीर्ण सियासत

कृषि सुधारों की चर्चा पिछले लगभग दो दशक से हो रही थी। अनेक समितियां, आयोग और विशेषज्ञ कृषि में बुनियादी सुधारों को वक्त की जरूरत बता चुके हैं। गत दिवस प्रधानमंत्री ने इन्हीं सब बातों का उल्लेख करते हुए जिस तरह यह कहा कि विपक्षी दल राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसानों को बरगला रहे हैं उससे स्वत: साबित हो जाता है कि नए कृषि कानूनों को लेकर कैसी संकीर्ण सियासत की जा रही है। इसकी अपेक्षा नहीं है कि अंधविरोध की जिद पर अड़े विपक्षी दल प्रधानमंत्री के इस सवाल का जवाब देने के लिए आगे आएंगे कि नए कृषि कानूनों से उन्हें दिक्कत क्या है? यदि वे अथवा मुट्ठी भर किसान संगठन इस सवाल पर नीर-क्षीर विमर्श के लिए तैयार होते तो अब तक गतिरोध का समाधान हो चुका होता। विपक्षी दल इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ सकते कि जब इन तीनों कानूनों से संबंधित बिल संसद में पेश किए गए थे तब उन पर अच्छी-खासी चर्चा हुई थी, लेकिन उनकी दिलचस्पी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों को गुमराह करने और प्रधानमंत्री को कोसने में अधिक थी। अब जब तीनों विधेयक कानून का रूप ले चुके हैं तब उनका विरोध कर विपक्षी दल अवसरवादी राजनीति का ही परिचय दे रहे हैं।

चंद किसान संगठन अपनी मांग देश भर के किसान संगठनों पर नहीं थोप सकते

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसान संगठनों को नए कृषि कानूनों पर कुछ आपत्ति हो सकती है, लेकिन अपनी इन आपत्तियों के आधार पर वे यह जिद पकड़कर नहीं बैठ सकते कि तीनों कृषि कानूनों को रद किया जाए। यह जोर जबरदस्ती वाली मांग है। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा कि चंद किसान संगठन अपनी मांग देश भर के किसान संगठनों पर थोप दें।

सरकार हर समस्या का समाधान करने के लिए तत्पर फिर भी किसान अड़ियल रुख पर अड़े

इस पर गौर करने की जरूरत है कि जब केंद्र सरकार किसानों की हर समस्या का समाधान करने के लिए तत्पर है तब किसान संगठन अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं। उन्होंने किस हद तक अड़ियल रुख अपना लिया है, इसका पता इससे चलता है कि वार्ता के दौरान केंद्रीय मंत्रियों के बोलना शुरू करते ही किसान संगठनों के नेता उनके समक्ष पीठ कर बैठ जाते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि कुछ किसान संगठन दिल्ली दंगे के आरोपितों और जेल में बंद संदिग्ध तत्वों की रिहाई की मांग कर रहे हैं। दिल्ली की घेरेबंदी वाले कथित आंदोलन के बहाने कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में खालिस्तानी तत्व भी सक्रिय हो गए हैं। इस सबसे यही लगता है कि वामपंथी, नक्सली और अन्य अतिवादी तत्व किसानों के बहाने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं।

किसानों की तीनों कृषि कानून वापस लिए जाने की मांग को पीएम मोदी ने कर दिया अस्वीकार

यह उचित ही है कि मोदी सरकार किसान संगठनों की इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं कि पहले तीनों कृषि कानून वापस लिए जाएं। कृषि मंत्री के साथ-साथ प्रधानमंत्री ने ऐसे स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वे इस मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। यदि इस मांग को स्वीकार कर लिया गया तो किसी भी सरकार के लिए कानून बनाना और उसे लागू करना मुश्किल हो जाएगा। कल को अन्य कानूनों के विरोध में भी दस-बीस हजार लोग दिल्ली आकर यह मांग कर सकते हैं कि अमुक-अमुक कानून वापस लिए जाएं। ऐसी मांगों को मानने का मतलब होगा नियम-कानून, संविधान और लोकतंत्र की अनदेखी करना। ऐसी मांगों को मानने से केवल शासन चलाना ही मुश्किल नहीं होगा, बल्कि विभिन्न समूहों और संगठनों की अराजकता पर लगाम लगाना भी कठिन होगा।

किसान अपनी मांगों को लेकर किसी शहर की नाकेबंदी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

कृषि कानूनों से असहमत किसान संगठनों को धरना-प्रदर्शन का अधिकार है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा, लेकिन शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी की अनदेखी नहीं की जा सकती कि किसान अपनी मांगों को लेकर किसी शहर की नाकेबंदी नहीं कर सकते हैं और विरोध का हक तभी तक है जब तक अन्य लोगों के बुनियादी अधिकार बाधित न हों। फिलहाल यह कहना कठिन है कि सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव पर सरकार का क्या रुख होगा कि क्या कुछ समय के लिए कृषि कानूनों पर अमल रोका जा सकता है? वैसे यह सुझाव समस्या पैदा करने वाला है।

सुप्रीम कोर्ट का काम मध्यस्थता कराना नहीं है

एक तो सुप्रीम कोर्ट का काम मध्यस्थता कराना नहीं है और दूसरे, यदि चंद लोगों की आपत्तियों के आधार पर किसी कानून पर अमल को रोकने का सुझाव दिया जाएगा तो इससे गंभीर समस्याएं उठ खड़ी हो सकती हैं।सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जिससे सरकारों के लिए शासन चलाना कठिन हो जाए। सुप्रीम कोर्ट को यह ध्यान रखना चाहिए कि जहां किसान संगठन अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं वहीं केंद्र सरकार नरमी का परिचय दे रही है।

सरकार 24 घंटे किसानों की समस्याएं सुलझाने के लिए तत्पर फिर भी किसान मनमानी का परिचय दे रहे

प्रधानमंत्री ने गत दिवस हाथ जोड़कर यह कहा कि सवाल श्रेय का नहीं है, नए कृषि कानूनों का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ किसानों को अधिकार संपन्न बनाना है। सरकार 24 घंटे किसानों की समस्याएं सुलझाने के लिए तत्पर है। केंद्र के ऐसे रुख के बावजूद किसान संगठन जिस तरह मनमानी का परिचय दे रहे हैं उससे यही लगता है कि वे इस बात का फायदा उठा रहे हैं कि सरकार किसानों के प्रति सख्त रवैया नहीं अपना सकती। यह ठीक नहीं कि सरकार की सदाशयता को किसान संगठन उसकी कमजोरी समझ लें।

[ लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं ]

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