[ अवधेश कुमार ]: महामारी कोविड-19 से उपजे भय, निराशा और अकेलेपन के बीच पूरे देश ने दीप जलाकर उत्साह और एकजुटता का जो संदेश दिया वह किसी चमत्कार से कम नहीं, लेकिन यह चमत्कार एक वर्ग को समझ नहीं आ रहा है। कुछ नेता एवं स्वयं को महाज्ञानी मानने वाले कथित लिबरल बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री के संबोधन एवं अपील के साथ जिस तरह की नकारात्मक और सच कहें तो ओछी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी थीं वे केवल इसका प्रमाण थीं कि ये भारतीय होते हुए भी भारत के मानस और भारतीय परंपराओं की अंत:शक्ति से अनभिज्ञ हैं।

कांग्रेस नेता अधीर रंजन ने कहा था, हम न दीप जलाएंगे, न मोमबत्ती, न टॉर्च

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने तो तुरंत कह दिया कि हम न दीप जलाएंगे, न मोमबत्ती, न टॉर्च। कुछ बुद्धिजीवी और पत्रकार कहने लगे कि मोदी देश को मदारी बना रहे हैं। उम्मीद थी कि देश भर में दीप जलाए जाने की तस्वीरों को देखकर वे आत्र्मंचतन करेंगे। दुर्भाग्य से उनका स्वर वही है। उनकी खीझ भरी प्रतिक्रियाओं से लग रहा है, मानो पूरा देश अज्ञानी और अंधविश्वासी है। जब 22 मार्च को पूरे देश ने प्रधानमंत्री की अपील पर जान जोखिम में डालकर काम करने वालों के सम्मान में ताली, थाली, घंटी और शंख बजाकर अविस्मरणीण दृश्य उत्पन्न कर दिया था तब भी इस समूह की ऐसी ही प्रतिक्रिया थी।

पीएम ने ऐसा नहीं कहा था कि कोरोना से बचने के लिए और कुछ करने की जरूरत नहीं

इन पर केवल तरस ही खाया जा सकता है, लेकिन यह प्रश्न उठाना जरुरी है कि क्या प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा था कि आप लोग कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए कुछ न करें, बस रविवार 5 अप्रैल रात 9 बजे 9 मिनट घर की लाइट बंद कर मोमबत्ती, टॉर्च, दीये या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाएं? जाहिर है उन्होंने ऐसा नहीं कहा था और न ही उनका ऐसा कोई मंतव्य था कि कोरोना से बचने के लिए और कुछ करने की जरूरत नहीं।

कोरोना से बचाव के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर युद्धस्तर पर कार्य कर रही हैं

केंद्र और राज्य सरकारों से जितना बन रहा है, युद्धस्तर पर बचाव और इलाज का कार्य चल रहा है। प्रधानमंत्री लगातार समाज के सभी समूहों से अलग-अलग चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्रियों से दो बार चर्चा कर यह जाना कि कहां क्या स्थिति है? फिर केंद्र क्या कर सकता है, इसकी घोषणाएं कीं। उन पर अमल भी हो रहा है। उनकी विशेषज्ञों, डॉक्टरों से लगातार बातचीत भी हो रही है। इसी का परिणाम है कि दुनिया के प्रमुख देशों की तरह हमारे यहां अभी तक त्राहि-त्राहि की स्थिति नहीं है।

तब्लीगी जमात की धर्मांधता ने देश को चिंता में डाल दिया

हां, तब्लीगी जमात की धर्मांधता और जाहिलियत से अवश्य चिंता बढ़ी है। बीते 15-16 दिन में मोदी के तीनों संबोधनों और फिर मन की बात में कोई बात ऐसी नहीं थी जिसकी आलोचना की जाए। देश के नेता की जिम्मेदारी का पालन करते हुए उन्होंने लोगों को सचेत किया, उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराया और सामूहिक निराशा एवं भय का भाव दूर करने की पहल की। इसका प्रत्यक्ष सकारात्मक असर स्वास्थ्यकर्मियों से लेकर आवश्यक सेवा करने वालों पर तो दिखा ही, देश की एकता का आभास भी हुआ, लेकिन इसके अलावा भी कुछ हुआ। उस दिन की आंतरिक अनुभूतियों का वर्णन अनेक लोगों ने सोशल मीडिया पर किया है। उसे जरूर पढ़ना चाहिए। ऐसे लोग जो इन सबमें विश्वास नहीं करते, उन्होंने भी लिखा कि जब पूरा मोहल्ला ताली बजा रहा था तो उनके अंदर एक विशेष अनुभूति हो रही थी। किसी ने लिखा कि हमारे भीतर ऐसी भावुकता उत्पन्न हुई कि आंखें नम हो गईं। ऐसे कदमों के सूक्ष्म प्रभाव भी होते हैं जो हमें प्रत्यक्ष नहीं दिखते।

कोविड-19 के प्रकोप से लोगों को सुरक्षित रखने के लिए देशव्यापी कार्यक्रमों से लोग एकजुट हैं

देश-दुनिया में कोविड-19 का प्रकोप जिस तरह सिर उठाए हुए है उसमें हमें कब तक बंधन में रहना पड़ेगा, कहना कठिन है। यदि देश को कोरोना के खिलाफ संघर्ष से जोड़ना है तो बहुत सोच-समझकर ऐसे सहज देशव्यापी कार्यक्रम देने होंगे जिनसे आपसी जुड़ाव का अनुभव हो, आत्मविश्वास बना रहे और एकजुटता का भाव पैदा हो ताकि नकारात्मकता कम होकर सकारात्मकता का आवेग पैदा हो।

पीएम की अपील पर नौ बजे नौ मिनट के लिए घर की बत्तियां बंद कर हर वर्ग ने उत्साह से भाग लिया

यह मान लेना निरी नासमझी होगी कि प्रधानमंत्री की एक अपील पर नौ मिनट के लिए घर की सारी बत्तियां बंद कर अपने दरवाजों और बालकनी में आकर रोशनी करने वाले अंधभक्त हैं। देश भर से आई खबरें बता रहीं हैं कि इसमें हर वर्ग के लोगों ने पूरे उत्साह से भाग लिया। इनमें किसानों, मजदूरों से लेकर छात्र, शिक्षक, सैनिक, पुलिस, सरकारी अधिकारी, सैन्य बल, न्यायाधीश, उद्यमी, कलाकार, पत्रकार और यहां तक कि डॉक्टर और वैज्ञानिक भी शामिल थे।

रोशनी के साथ भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से आकाश गूंज रहा था

रोशनी के साथ भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से आकाश गूंज रहे थे। अनेक जगह लोगों ने इसमें कुछ और पूरक कार्यक्रम जोड़ लिया जिसमें मंत्रोच्चारण से लेकर हवन तक सम्मिलित थे। सबसे बढ़कर लोगों ने लक्ष्मण रेखा का पालन किया।

कोरोना के अंधकार के बीच हमें प्रकाश की ओर जाना है

प्रधानमंत्री ने यह कहकर इस पहल का लक्ष्य स्पष्ट किया था कि कोरोना के अंधकार के बीच हमें प्रकाश की ओर जाना है और गरीब भाई-बहनों को निराशा से आशा की ओर लेकर जाना है। उन्होंने यह भी कहा था कि मां भारती का स्मरण करते हुए देशवासियों के बारे में सोचना है। यह माना जा सकता है कि इस प्रतीकात्मक कार्यक्रम से लोगों को महसूस हुआ कि देश साथ खड़ा है। जनता की सामूहिक शक्ति को जागृत करना और उसकी सामूहिक चेतना को सकारात्मक उर्जा और उत्साह से जोड़ना भी कोरोना के खिलाफ लड़ाई है।

उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है

लोगों को उनकी शक्ति का अहसास कराना एक तरह से उनके विश्वास एवं उत्साह को संबल प्रदान करना होता है। उत्साह बड़ा बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। कोई कुछ भी कहे, पर सामूहिक भाव के असर को नकारा नहीं जा सकता। ध्यान रहे कि कई बार संकट भी किसी राष्ट्र की सामूहिक मानसिकता और आचरण में व्यापक परिवर्तन का कारण बनता है।

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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