सतीश सिंह। हमारे देश की एक बड़ी आबादी को निवेश की पर्याप्त समझ नहीं है। अधिकांश लोग अभी भी बैंक, डाकघर, पब्लिक प्रोविडेंट फंड, सुकन्या समृद्धि योजना, किसान विकास पत्र, राष्ट्रीय बचत पत्र आदि में निवेश करते हैं, क्योंकि ये निवेश के सुरक्षित विकल्प हैं। शेयर बाजार की पेचीदगी उन्हें समझ में नहीं आती है। एक अनुमान के अनुसार केवल 2.78 करोड़ भारतीय शेयर बाजारों में निवेश करते हैं, जो देश की आबादी का महज दो प्रतिशत है।

खुदरा निवेशकों के बीच राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी), पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) और सुकन्या समृद्धि योजना (एसएसवाइ) सबसे ज्यादा लोकप्रिय जमा योजनाएं हैं। एनएससी पर अभी 6.8 प्रतिशत की दर से वार्षकि आधार पर ब्याज दिया जा रहा है, जबकि बैंकों में अधिकतम पांच से 6.5 प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जा रहा है। अगर निवेशक आयकर की पुरानी व्यवस्था के तहत आयकर जमा कर रहे हैं तो उन्हें एनएससी से और भी ज्यादा फायदा मिल सकता है, क्योंकि पुरानी व्यवस्था के तहत अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक एनएससी में निवेश करने पर आयकर में छूट का लाभ मिलता है।

वहीं पीपीएफ में 7.1 प्रतिशत की दर से सालाना आधार पर ब्याज दिया जाता है। पीपीएफ में निवेश करने पर किसी तिमाही या वित्त वर्ष में किए गए निवेश की जगह पूरी जमा राशि पर ब्याज दी जाती है। इतना ही नहीं, पीपीएफ में जमा राशि पर आयकर की धारा 80 सी के तहत निवेश पर आयकर में छूट भी दी जाती है। साथ ही, परिपक्वता अवधि जो 15 साल है उसके पूरा होने पर परिपक्वता राशि पर भी आयकर नहीं देना होता है। इस तरह, एनएससी की तरह आयकर में छूट मिलने से पीपीएफ निवेशकों के लिए और भी ज्यादा लाभदायक बन जाता है।

लोग सरकारी लघु बचत योजनाओं में निवेश करते हैं, जिसे राष्ट्रीय लघु बचत कोष में जमा किया जाता है। इस राशि का उपयोग केंद्र और राज्य सरकारें अपना वित्तीय घाटा पूरा करने के लिए करती हैं और बची हुई राशि को वे सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करती हैं। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान सरकारी लघु बचत योजनाओं में लोगों ने 5.96 लाख करोड़ रुपये सकल निवेश किया था। जाहिर है, ब्याज दर अधिक होने से सरकार को जमा राशि पर ज्यादा ब्याज निवेशकों को ब्याज के तौर पर देना पड़ रहा है, लेकिन उसे जमाराशि से कम आय हो रही है। सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश की गई राशि पर सरकार को फिलहाल कम प्रतिफल मिल रहा है, जिससे सरकार को कोरोना काल में राजकोषीय संतुलन बनाए रखने में मुश्किल हो रही है। इसी वजह से छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में 31 मार्च 2021 को 1.1 प्रतिशत तक की कटौती की गई, लेकिन बाद में इस फैसले को वापस लिया गया।

महामारी ने सरकार के राजस्व स्रोत को कम किया है, लेकिन यह भी सच है कि आम जनता के आय स्रोत को भी इसने कम किया है। भारत में एक बड़ा तबका आज भी सरकारी लघु बचत योजनाओं में निवेश करना पसंद करता है, क्योंकि इन योजनाओं में निवेश करने से उनका निवेश सुरक्षित रहता है और एक निश्चित प्रतिफल भी मिल जाता है। इधर, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की स्टेट ऑफ वल्र्ड पॉपुलेशन 2019 की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में भारत में 8.16 करोड़ लोगों की उम्र 65 वर्ष से ऊपर की थी। अगर इस आबादी का एक प्रतिशत यानी 8.16 लाख बुजुर्ग भी सरकारी लघु बचत योजनाओं में निवेश कर जीवनयापन कर रहे हैं तो छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरों में कटौती करने से उनके सामने भुखमरी की नौबत आ सकती है। 

[आर्थिक मामलों के जानकार]

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