सुशील कुमार सिंह। नए साल के आगाज पर मोदी सरकार भी कई मामलों में संकल्पबद्ध हो रही होगी, मगर बीते साल की चुनौतियां उसे कहीं न कहीं चपेट में लिए हुए है। मसलन नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, एनपीआर समेत महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और प्रदेशों में दल को मिल रही हार। सुस्त अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने में सरकार कई प्रयोगों के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं कर पाई है। महंगाई उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा है। जाहिर है जब क्रय शक्ति घटती है तो खपत भी घटती है और इसका नकारात्मक असर जीडीपी पर पड़ता है। महंगाई को तार्किक स्तर पर बनाए रखना और बीते छह साल के मुकाबले निम्न स्तर पर पहुंच चुकी 4.5 फीसद जीडीपी को 7 या 8 फीसद के इर्द-गिर्द लाना साल 2020 में सरकार के लिए पहली चुनौती रहेगी।

गौरतलब है कि 5 टिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए 8 प्रतिशत जीडीपी की आवश्यकता है। सरकार ने अर्थव्यवस्था का जो भारी-भरकम स्वरूप बनाने का मन बनाया है मौजूदा जीडीपी को देखते हुए कह सकते हैं कि यह आसान राह नहीं है। अगर भारत को बदलाव की चुनौती का मुकाबला करना है तो केवल सामान्य विकास से काम नहीं चलेगा। इसके लिए बुनियादी बदलाव की जरूरत पड़ेगी जिसकी पहली आवश्यकता जीडीपी में बढ़ोतरी ही है। साल 2024 तक 5 डॉलर की अर्थव्यवस्था करने का इरादा कहीं कागजों तक न रह जाए इसके लिए कृषि, विनिर्माण, पूंजी, निवेश आदि को लेकर लंबी छलांग लगानी होगी। 

राजकोषीय घाटा भी लक्ष्मण रेखा लांघ रहा है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से कर संग्रह घटा है और चालू वित्त वर्ष में इसको सकल घरेलू उत्पाद के 3.4 प्रतिशत तक रखने का लक्ष्य है। हालांकि आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह लक्ष्य भी किसी चुनौती से कम नहीं। गौरतलब है कि बढ़ता राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करता है जिसके चलते ब्याज दरों के साथ महंगाई भी बढ़ती है। यही कारण है कि पिछली 5 समीक्षाओं में रिजर्व बैंक ने 5 बार रेपो रेट में कमी करते हुए बीते फरवरी से अब तक 1.35 फीसद की कटौती कर चुका है। जिसके चलते बैंकों पर ब्याज दर कम करने का दबाव बना। इतना ही नहीं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कटौती की और भी संभावना है जो कहीं न कहीं इसका निचला स्तर होगा। आरबीआइ की यह चिंता रही है कि आर्थिक सुशासन को कैसे पटरी पर दौड़ाया जाए। इसी के चलते वह लगातार रेपो दर में कटौती करता रहा।

सरकार ने भी सितंबर में कॉरपोरेट टैक्स को 10 फीसद घटा कर आर्थिक सुस्ती को दूर करने की कोशिश की। साल 2020 में यह भी चुनौती रहेगी कि इसका लाभ सीधे जनता को कैसे मिले, ताकि देश आर्थिक सुशासन की राह पर चल पाए। निजी निवेश को आकर्षित करना सरकार की चुनौती बनी रहेगी। वित्त वर्ष 2014-15 में निजी निवेश की दर 30.1 फीसद थी जो 2018-19 में 28.9 प्रतिशत ही रही। आंकड़ों के अनुसार निजी एवं सरकारी निवेश बीते 14 साल के न्यूनतम स्तर पर है जिसे बढ़ाना एक नई चुनौती रहेगी।

बीते समय में देश भर में छोटी कंपनियां कुछ अधिक ही प्रभावित हुई हैं और बड़ी कंपनियों में भी नौकरी के अवसर घटे हैं। इतना ही नहीं सरकारी नौकरियां भी समय के साथ सिमट रही हैं। बीते वर्ष बेरोजगारी दर 6.1 फीसद पर चली गई थी जो 45 साल में सबसे ज्यादा थी। नए वर्ष में इस आरोप से मुक्त होने के लिए सरकार को एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा। गौरतलब है कि साल 2027 तक भारत सर्वाधिक श्रम-बल वाला देश हो जाएगा और इसकी खपत के लिए बड़े नियोजन की दरकार होगी। अनुमान तो यह भी है कि साल 2022 तक 24 सेक्टरों में 11 करोड़ अतिरिक्त मानव संसाधन की जरूरत होगी। खाद्य कीमतों में तेजी के चलते मूल्य आधारित महंगाई बीते नवंबर में बढ़कर 0.58 फीसद पर पहुंच गई, जो कि अक्टूबर में 0.16 थी। सब्जी और दाल समेत कई वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से खुदरा महंगाई दर 5.54 प्रतिशत पर चली गई है।

वहीं किसानों की आय दोगुनी करने का जो लक्ष्य सरकार ने तय किया है। समय हालांकि 2022 है, पर इस चक्र में 2020 भी रहेगा। सर्वाधिक उत्पादकता वाले इस क्षेत्र पर देश की लगभग 58 प्रतिशत जनसंख्या निर्भर करती है। कृषि का आधुनिकीकरण नहीं होने से किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में हेरफेर कर सरकार राहत की बात करती है, पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की चुनौती पहले भी रही है और आगे भी रहेगी। हालांकि झारखंड की हार भी भाजपा के लिए मुश्किल लेकर आई है। वर्ष 2020 में दिल्ली और बिहार का चुनावी भंवर भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है। मोदी सरकार का सियासी नक्शा भारत से सत्ताधारी के तौर पर राज्यों में जिस तरह सिमट रहा है जाहिर है 2020 के चुनाव चुनौतीपूर्ण रहेंगे। इतना ही नहीं नागरिकता कानून, एनआरसी और एनपीआर को लेकर देश में बन रहे माहौल को भी साल 2020 में अपने अनुरूप करना मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहेगा।

(लेखक वाईएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के निदेशक हैं)

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Edited By: Kamal Verma