[सुशील कुमार सिंह]। विश्व के राजनीतिक मंच पर भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाए इसके लिए यह जरूरी है कि वह पड़ोसी देशों को भरोसे में ले। पीएम मोदी का मालदीव और श्रीलंका दौरा इसका बेहतर उदाहरण है। लगातार दूसरी बार सत्ता में आने के बाद मोदी ने अपने पहले विदेश दौरे के पहले चरण में मालदीव तो दूसरे में श्रीलंका की यात्रा की। उनकी यह यात्रा भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को ही नहीं दर्शाता, बल्कि इन देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को भी संतुलित करने के तौर पर समझा जा सकता है। इस यात्रा का मकसद हिंद महासागर में स्थित मालदीव और श्रीलंका के साथ संबंध को और मजबूती प्रदान करना है। मालदीव की यात्रा कई मामले में काफी अहम मानी जा सकती है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे।

मालदीव को अपने बंदरहगाह विकास, स्वास्थ्य, कृषि, मत्स्य पालन, पर्यटन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में हमेशा दूसरे देशों से निवेश की अपेक्षा रही है। इस मामले में भारत ने उसकी बहुत मदद की है। ऐसे मामलों में चीन भी अवसर खोजता रहता है, ताकि हिंद महासागर में उसका दबदबा कायम रहे और इसमें वह काफी हद तक सफल भी रहा है। हालांकि, पीएम मोदी के दूसरे शपथ ग्रहण के बाद मालदीव में उनकी पहली विदेश यात्रा से चीन को चिंतित होना लाजमी है।

सार्क का सदस्य भी है मालदीव
सामाजिक और आर्थिक विकास हासिल कराने के मामले में भारत मालदीव को लेकर कभी पीछे नहीं रहा। फरवरी 2018 में जब मालदीव उथल-पुथल के दौर से जूझ रहा था तब भी भारत ने समस्या से उबारने के लिए जरूरी कूटनीतिक कदम उठाए थे। भारत विविध तरीके से मालदीव में अपनी उपस्थिति बढ़ा कर चीन के प्रभाव को कम करने की काट भी खोजता रहा है। मालदीव भारत की नौसेना के लिए हिंद महासागर में नौसेना अड्डे के रूप में उपयोग हो सकता है। मालदीव दक्षिण एशियाई देशों के समूह सार्क का सदस्य है और भारत के हितों से अंजान नहीं है। भारत मालदीव की आर्थिक सहायता भी करता रहा है। हालांकि पिछले आठ वर्षो में द्विपक्षीय स्तर पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली मालदीव यात्रा है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी पिछली बार नवंबर 2018 में राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद के शपथ समारोह में गए थे। लेकिन यह कोई अधिकारिक यात्रा नहीं थी।

आतंकी हमले के बाद श्रीलंका जाने वाले पहले विदेशी नेता
मोदी की यात्रा का दूसरा चरण तब शुरू हुआ जब पीएम का विमान माले से कोलंबो की ओर चला। जहां उन्होंने एक बार फिर आतंक को लेकर गहरी चिंता जताई और आतंकवाद से मिलकर लड़ने का आह्वान किया। दरअसल अप्रैल में श्रीलंका में ईस्टर के दिन आतंकी हमले के बाद श्रीलंका की यात्रा करने वाले मोदी पहले विदेशी नेता भी हो गए हैं। श्रीलंका की यात्रा को लाभदायक बताते हुए मोदी ने कहा कि हमारे दिल में श्रीलंका की खास जगह है। माना जा रहा है कि इस दौरे से श्रीलंका में विदेशी पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।

श्रीलंका से लिट्टे के सफाए का असर
श्रीलंका में भी चीन के प्रभाव को बाकायदा देखा जा सकता है। वर्ष 2009 में वहां लिट्टे का सफाया हो चुका है और इसी के साथ ही भारत और चीन पर अलग-अलग असर पड़ा है। भारत श्रीलंका को लेकर तटस्थ रहा। जबकि चीन ने अलग रुख अपनाया। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में उसने भारी निवेश करके अपना एक बड़ा बाजार खड़ा कर दिया। यहां के बुनियादी ढांचे में भी व्यापक निवेश कर भारत को पीछे धकेलने का काम किया। हंबनटोटा बंदरगाह के निर्माण में चीन मदद कर रहा है।

हिंद महासागर में ठिकाने बनाने की फिराक में चीन
चीन हिंद महासागर के बीच ठिकाना बनाने की फिराक में है। इससे हिंद महासागर में उसका दबदबा बढ़ जाएगा। चीन की इस तरह की हरकतों के कारण श्रीलंका व मालदीव के साथ अच्छे संबंध रखना भारत के लिए आवश्यक है। एक समय ऐसा भी था जब भारत और श्रीलंका के बीच में व्यापक मतभेद हुआ करते थे, परंतु बीते तीन दशकों से आपसी संबंध ठीक हैं। इसके पहले मोदी ने श्रीलंका के लोगों को लेकर ई-वीजा और मुक्त व्यापार द्विपक्षीय समझौते में सहयोग करके संबंध को आशा से भर दिया। फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर मोदी सरकार, श्रीलंका से बेहतर संबंध बनाए हुए है और आवश्यक मुद्दों पर कोलंबो से संपर्क साधती रही है। मोदी की यह यात्रा भले ही किसी खास संधि या समझौते को जन्म न दिया हो, लेकिन आपसी विश्वास के लिए कहीं अधिक जरूरी है।

सुशील कुमार सिंह
[निदेशक, वाइएस रिसर्च फाउंडेशन ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन]

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Posted By: Amit Singh

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