[ रविशंकर प्रसाद ]: पांच अगस्त 2020 का दिन भारत की संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक विरासत का एक बहुत ही पावन और ऐतिहासिक पड़ाव है। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्म स्थान अयोध्या में उनके भव्य मंदिर के निर्माण का कार्य आरंभ हो रहा है। पांच सौ वर्षों बाद यह पावन दिन आया है। इसकी खुशी और भावुकता हम सभी समझ सकते हैं। प्रभु राम के प्रति आस्था और उनके जीवन की लीला भारतीयों के मानस में स्वाभाविक रूप से बसी है। इस आस्था के प्रति आदर और उनके जीवन की अलौकिक लीला बताने के लिए न किसी शिक्षक की आवश्यकता है और न किसी उपदेशक की। ये स्वाभाविक रूप से सामान्य भारतीयों के मानस में समाहित हैं। कभी-कभी घोर आश्चर्य होता है कि प्रभु राम के जन्म स्थान पर उनका एक भव्य मंदिर बनाने में आजाद भारत को सत्तर साल लग गए।

मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा के अनुसार ही न्याय के रास्ते से राम मंदिर के निर्माण पर लगी मुहर

हम सभी आस्थाओं का सम्मान करते हैं और यही हमारे संविधान का मूल तत्व भी है किंतु इस सच्चाई से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि कथित बाबरी मस्जिद इबादत के लिए नहीं, बल्कि एक आक्रांता के निर्देश पर हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए बनाई गई थी। ऐसा कई स्थानों पर हुआ था। अच्छा होता सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर आजादी के बाद के नेताओं ने उसी भाव से एक भव्य राम मंदिर बनने दिया होता। सत्तर साल का लंबा संघर्ष एक विडंबना ही है जिसकी भविष्य में समीक्षा होती रहेगी। यह पीड़ादायक है कि देश की सार्वभौमिक राम भक्ति के ऊपर कुछ दलों और नेताओं की वोटों की राजनीति हावी हो गई। यह संतोष का विषय है कि मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा के अनुसार ही कानून और न्याय के रास्ते से इस मंदिर के निर्माण पर मुहर लगी। इसके लिए जो संघर्ष हुआ और जिन लोगों ने अपना जीवन होम किया, आज उन सभी को नमन करने का दिन है।

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने साक्ष्यों के व्यापक विवेचन के पश्चात सर्वानुमति से दिया था निर्णय

यह मेरा परम सौभाग्य रहा कि इस आंदोलन में पार्टी कार्यकर्ता और रामभक्त के रूप में मुझे सहभागी होने का अवसर मिला। रथयात्रा के दौरान जब लालकृष्ण आडवाणी को लालू प्रसाद सरकार द्वारा बिहार में गिरफ्तार किया गया तब भी मैं पटना उच्च न्यायालय में उनका वकील था। कोर्ट के आदेश पर ही उन्हें संसद की कार्रवाई में भाग लेने का अवसर मिला। एक वकील के रूप में मुझे इलाहबाद उच्च न्यायालय में रामलला और हिंदुओं के पक्ष से प्रस्तुत होने की प्रतिष्ठा भी मिली। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने जन्मस्थान के संबंध में ंहिंदुओं की प्रार्थना को स्वीकार किया और वह स्थान हिंदुओं को दिया और बाकी एक तिहाई निर्मोही अखाड़े को और एक तिहाई मुस्लिम पक्ष को। इस मामले की सुनवाई में कुछ रोचक प्रकरण भी हुए। आरंभिक सुनवाई के दौरान ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि जहां रामलला विराजमान हैं उसके लगभग पचास फीट की परिधि को छोड़कर शेष हिस्से की पुरातत्व विभाग द्वारा खोदाई कराई जाए। दोनों पक्ष इसे लेकर सशंकित थे कि खोदाई में पता नहीं क्या निकलेगा? खोदाई के बाद गर्भ गृह के आसपास सातवीं शताब्दी के मंदिर के अवशेष निकले। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और तमाम विरोध और अवरोध के कारण लगभग 12 साल बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने साक्ष्यों के व्यापक विवेचन के पश्चात सर्वानुमति से निर्णय दिया। इस निर्णय के चार बिंदु उल्लेखनीय हैं।

मुस्लिम पक्ष द्वारा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया

1. सैकड़ों वर्षों सेे हिंदुओं का विश्वास राम जन्मभूमि की आध्यात्मिक पहचान में सतत रूप से बना रहा और वे उसकी पूजा भी करते रहे। 2. मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद निर्माण के सवा तीन सौ साल तक कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि उनका इस पर एकमात्र आधिपत्य था। 3. मस्जिद बनने के बावजूद हिंदुओं का यह विश्वास कभी नहीं हिला कि यह प्रभु राम का जन्मस्थान है और वे इसकी पूजा करते रहे। 4. पुरातत्व विभाग की खोदाई और रिपोर्ट से यह कहा जा सकता है कि मस्जिद की दीवार एक मंदिर के अवशेष पर बनाई गई। उपरोक्त बिंदुओंके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पूरा स्थान हिंदू पक्ष को दिया और सरकार को मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया। मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ जमीन अलग से देने का भी निर्देश दिया। देशवासियों के मर्यादित आचरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण हमें यह भी दिखाई पड़ा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर वर्षों से प्रतीक्षित इस निर्णय के बावजूद देश के सभी वर्गों ने विनम्रता से इसे स्वीकार किया। यह भी तो प्रभु राम की मर्यादा के आशीर्वाद से ही हुआ। 

राम मंदिर राष्ट्रीय आत्मसम्मान का विषय

राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर राष्ट्र का भी मंदिर है। भारत के स्वाभिमान, आत्मसम्मान और भारत की आध्यात्मिक विरासत-‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति’ का भी जयगान है। आखिर यह राष्ट्रीय आत्मसम्मान का विषय क्यों है? आजादी के बाद ब्रिटिश सम्राटों की दिल्ली और देश के विभिन्न इलाकों में जो बड़ी-बड़ी मूर्तियां लगी हुई थीं, उन्हें हटाकर संग्र्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया, वह भी बिना किसी विरोध के। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि ये मूर्तियां स्थापत्य कला की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक आधिपत्य की प्रतीक थीं, लेकिन यही सोच राम मंदिर के बारे में क्यों नहीं अपनाई गई? इसलिए आज का दिन राष्ट्र के आत्मसम्मान और स्वाभिमान के लिए भी अहम है। भव्य राम मंदिर के बाद अयोध्या नए रूप में संवरेगी और निखरेगी। विश्व की धरोहर बनेगी। लाखों की संख्या में भक्त और पर्यटक आएंगे और इलाके के विकास में चार चांद लगाएंगे। यही मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार का सपना भी है।

दुनिया भर में फैले करोड़ों हिंदू आज पुलकित हैं

जहां आज हम भक्ति से सराबोर हैं और अपनी विरासत के आत्मसम्मान को लेकर गौरव गान कर रहे हैं वहीं प्रभु राम की मर्यादा का ध्यान रखते हुए हमें संयम, सदाचार, भारतीयता की भावना और संविधान के सह-अस्तित्व के मूल्यों का भी सम्मान करना चाहिए। यह भाव हमें और मजबूत करेगा। जहां भारत और दुनिया भर में फैले हुए करोड़ों हिंदू आज पुलकित हैं, वहीं मेरा विश्वास है कि सभी आस्थाओं के अधिकांश भारतीय भी प्रसन्न हैं। कबीर, रहीम और रसखान की सोच को आज एक नई मजबूती मिल रही है। यही तो है भारत की आध्यात्मिक विरासत जो सभी को अनुप्राणित करती है। यही तो मर्यादा पुरुषोत्तम के जीवन का उपदेश भी है।

( लेखक केंद्रीय कानून एवं न्याय, संचार, इलेक्ट्रॉनिक व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं और राम जन्मभूमि मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हिंदू पक्ष के वकील थे )

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