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फिटनेस के लिए नहीं, सजा के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार, रोज 8 घंटे कैदियों को तड़पाती थी ये मशीन

Published: Sun, 31 May 2026 04:04 PM (IST)

ट्रेडमिल का इस्तेमाल सेहत बनाने के लिए नहीं, बल्कि कैदियों को सजा देने के लिए हुआ था।

सजा देने के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार (Picture Courtesy: Freepik)

सजा देने के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार (Picture Courtesy: Freepik)

HighLights

  1. ट्रेडमिल का आविष्कार कैदियों को सजा देने के लिए हुआ

  2. विलियम क्यूबिट ने 1818 में 'ट्रेडवील' बनाई थी

  3. कैदी इस पर रोज 6-8 घंटे चलते थे

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में जब हम जिम जाते हैं, तो फिटनेस के लिए ट्रेडमिल पर दौड़ना एक बेहद आम बात लगती है। सेहत बनाने और खुद को फिट रखने के लिए लोग इस मशीन का जमकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज सेहत बनाने वाली यह मशीन कभी इंसानों को तड़पाने और सजा देने के लिए बनाई गई थी?

जी हां, ट्रेडमिल को बनाने का असली मकसद फिटनेस बिल्कुल भी नहीं था, बल्कि इसकी शुरुआत एक क्रूर सजा के रूप में हुई थी। आइए जानें आखिर ट्रेडमिल का इस्तेमाल पहले के समय में कैसे होता था। 

कैदियों को सजा देने के लिए हुआ था आविष्कार

बात साल 1818 की है, जब ब्रिटेन के एक इंजीनियर विलियम क्यूबिट ने एक अनोखी मशीन बनाई। उन्होंने इस मशीन को ट्रेडवील नाम दिया। इस मशीन को बनाने के पीछे उनका मकसद लोगों को सेहतमंद बनाना नहीं, बल्कि जेल के कैदियों से बेहद कड़ी मेहनत करवाना और उन्हें अनुशासित करना था। यह मशीन उस दौर में कैदियों के लिए खौफ और बड़ी तकलीफ का प्रतीक मानी जाती थी।

गिरने का लगातार खतरा

यह ट्रेडवील आज के आधुनिक ट्रेडमिल जैसी साधारण मशीन नहीं थी। यह एक बहुत विशाल और बड़े पहिए जैसी मशीन थी। इस पर कैदियों को खड़ा कर दिया जाता था और उन्हें लगातार इस पर चलते रहना पड़ता था। इसे देखकर ऐसा लगता था मानो कैदी कभी न खत्म होने वाली सीढ़ियां चढ़ रहे हों।

इस मशीन पर चलते वक्त कैदियों को बेहद सावधान रहना पड़ता था। वहां जरा सा रुकना या सुस्ताना भी बड़े जोखिम से खाली नहीं था, क्योंकि रफ्तार धीमी होते ही बैलेंस बिगड़ने और नीचे गिरने का डर हमेशा बना रहता था।

Treadmill

(Picture Courtesy: Freepik)

मेहनत का इस्तेमाल और बिना मकसद की क्रूरता

इस मशीन पर कैदियों के लगातार चलने से जो एनर्जी पैदा होती थी, उसका इस्तेमाल कुछ जरूरी कामों में किया जाता था, जैसे- उस दौर में इस ऊर्जा से अनाज पीसने और पानी पंप करने जैसे काम निपटाए जाते थे, लेकिन हर जेल में इसका इस्तेमास किसी काम के लिए नहीं होता था। 

कई जेलों में तो इसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ कैदियों को तड़पाने और सजा देने के लिए किया जाता था। इसका मतलब था कि कैदियों को बिना किसी ठोस मकसद या वजह के, घंटों तक बस उस घूमते पहिए पर लगातार चलते जाना पड़ता था।

रोज 6 से 8 घंटे का टॉर्चर

यह पूरी प्रक्रिया कैदियों के लिए शारीरिक रूप से जितनी थका देने वाली थी, मानसिक रूप से भी उतनी ही प्रताड़ित करने वाली थी। कैदियों को हर रोज लगातार 6 से 8 घंटे तक इस मशीन पर चलना पड़ता था। धीरे-धीरे वक्त के साथ यह बात पूरी तरह साफ हो गई कि यह मशीन कैदियों में सुधार लाने के बजाय केवल क्रूरता और अत्याचार की निशानी बनकर रह गई है। 

इस क्रूरता को देखते हुए आखिरकार 19वीं सदी के अंत तक इस प्रथा और मशीन के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। यही क्रूर मशीन बाद के सालों में बदलती गई और आज हमारे बीच फिटनेस का सबसे बड़ा जरिया बन गई।


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