तुष्टिकरण नहीं, संतुष्टिकरण है यूसीसी
“डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान को केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना था। समान नागरिक ...और पढ़ें

विमलेश निगम। सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य, हजारों वर्षों की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत और देश की सबसे बड़ी विधानसभा, उत्तर प्रदेश की पहचान जितनी व्यापक है, उसकी सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। इसलिए यहां होने वाला कोई भी बड़ा विधायी परिवर्तन सिर्फ राज्य की सीमा में ही सीमित नहीं रहता, राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करता है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) की बहस इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े नागरिक अधिकारों में अलग-अलग प्रावधानों के बीच समानता, लैंगिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना इसके पक्ष में प्रमुख तर्क हैं।
उत्तर प्रदेश में यूसीसी की जरूरत इसलिए भी महसूस होती है कि नागरिक की पहचान उसकी व्यक्तिगत आस्था से पहले समान अधिकारों और समान कानून से हो। संविधान की समानता की भावना को व्यवहार में उतारने की दिशा में प्रदेश के लिए निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) की मूल अवधारणा में यह सिद्धांत निहित है कि कानून की समानता केवल शासन की सुविधा नहीं, नागरिक सम्मान और संवैधानिक न्याय का आधार है। उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में इस दिशा में पहला कदम उठाया। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने 2026 में अपने विधेयक पारित किए और इस क्रम में अब उत्तर प्रदेश की चर्चा हो रही है।
सवाल यह नहीं कि यूसीसी जरूरी है या नहीं, सवाल यह है कि जिस राज्य ने देश को कानून व्यवस्था में एक नई पहचान दी, क्या उसे सामाजिक न्याय की दिशा में अपने कदम नहीं बढ़ाने चाहिए? कानून-व्यवस्था को शासन के मूल एजेंडे में रखने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए जरूरी है कि इस दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।
समान नागरिक संहिता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष किसी धर्म विशेष के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि नागरिक के पक्ष में खड़ा होना है। पहला और सबसे बड़ा पक्ष है ‘महिला न्याय की गारंटी’। मोदी सरकार ने तीन तलाक जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म कर मुस्लिम बहनों को उस भय से मुक्त किया, जिसमें एक झटके में उनका पूरा जीवन उजड़ सकता था। योगी सरकार को अब उस अधूरे न्याय को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ना है।
प्रस्तावित यूसीसी में बहुविवाह, निकाह, हलाला और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के एकतरफा तलाक पर पूर्ण प्रतिबंध है। पैतृक संपत्ति में अब बेटी को बेटे के बराबर अधिकार मिलेगा, और 'अवैध संतान' जैसे अपमानजनक शब्दों को कानून से हटाकर हर बच्चे को समान उत्तराधिकार दिया गया है। यह किसी एक समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। यह तुष्टिकरण नहीं है, यह संतुष्टिकरण है, जहां हर धर्म की बेटी को बराबर की सुरक्षा और बराबर का सम्मान मिलता है।
इसका दूसरा पक्ष है कानून के राज का विस्तार। योगी मॉडल का मतलब ही रहा है माफिया राज का अंत और एक ऐसा शासन जहां कानून सबके लिए समान हो। आज विवाह, तलाक और विरासत को लेकर अलग-अलग धार्मिक कानूनों के कारण थाने और कचहरी में भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़ा और शोषण की गुंजाइश बनी रहती है। हर शादी और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण इस खेल को खत्म करेगा।
इससे भी आगे की बात करें तो यूनिफार्म सिविल कोड लिव-इन रिलेशनशिप का एक महीने के भीतर अनिवार्य पंजीकरण और पहचान छिपाकर की जाने वाली शादियों, दबाव या धोखे से होने वाले संबंधों और नाबालिग विवाह पर प्रभावी रोक लगाएगा। यह प्रावधान खासकर युवाओं और बेटियों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा, जो उन्हें छल और शोषण से बचाता है।
परंपरा का सम्मान, भेदभाव का अंत यूसीसी का तीसरा पक्ष है। योगी सरकार यह भली-भांति समझती है कि एकरूपता के नाम पर सांस्कृतिक पहचान को कुचला नहीं जा सकता। इसीलिए संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आने वाली सभी अनुसूचित जनजातियों और उनके परंपरागत अधिकारों को यूसीसी के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है। यह अपवाद अकेले ही यह साबित करने के लिए काफी है कि यूसीसी किसी की संस्कृति मिटाने नहीं, बल्कि सभी नागरिकों को एक समान न्याय देने के लिए लाया गया है। जो लोग इसे सांस्कृतिक अतिक्रमण बताते हैं, उन्हें इस संवैधानिक संरक्षण पर गौर करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें तो चौथा और शायद सबसे निर्णायक पक्ष है कि यूपी के पास इसका महा-मॉडल बनने का अवसर है। उत्तराखंड सवा करोड़ की आबादी वाला राज्य है, जबकि उत्तर प्रदेश चौबीस करोड़ का विशाल प्रदेश। जब यह कानून बनेगा, तो वह महज एक राज्य का कानून नहीं रहेगा, यह एक महा-मॉडल होगा, जिसे आने वाले वर्षों में पूरा देश एक संदर्भ बिंदु के रूप में देखेगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यदि उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू होता है, तो यह एक स्पष्ट संदेश देगा कि उत्तर प्रदेश अब केवल जनसंख्या में नहीं, बल्कि न्याय और सुशासन में भी देश का नेतृत्व करने को तैयार है।
संपत्ति और उत्तराधिकार का मसला भी इसी कड़ी में महत्वपूर्ण है। ग्रामीण उत्तर प्रदेश में आज भी संपत्ति विवाद सामाजिक तनाव और पारिवारिक कलह का सबसे बड़ा कारण बनते हैं। जब कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करता है, तो वह असमानता को संस्थागत रूप दे देता है। जब कानून सबके लिए एक समान होता है, तो वह न्याय को सार्वभौमिक बनाता है। यही फर्क तुष्टिकरण और संतुष्टिकरण में है। एक वर्ग-विशेष को अलग रियायत देना विभाजन पैदा करता है, जबकि सबको बराबर अधिकार देना समाज को जोड़ता है।
अब बात विरोध की। कांग्रेस, सपा और एआईएमआईएम जैसे दल इसका विरोध करते हुए अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता यह भली-भांति समझती है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ पूजा-पद्धति की स्वतंत्रता है, न कि महिलाओं के शोषण या असमान व्यवहार को बचाए रखने की स्वतंत्रता। इसलिए तस्वीर स्पष्ट है।
यूसीसी उत्तर प्रदेश के लिए केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, महिला सुरक्षा और कानून के राज को मजबूत करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। यह किसी को हाशिए पर धकेलने के लिए नहीं, बल्कि हर नागरिक—चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो, को समान गरिमा और समान न्याय देने के लिए लाया जाना चाहिए। सही भावना, संवेदनशीलता और व्यापक संवाद के साथ यूसीसी लागू होने पर उत्तर प्रदेश न केवल अपने 24 करोड़ नागरिकों के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक नया मानक स्थापित करेगा।
एक ऐसा मानक, जो जनसंख्या में ही नहीं, न्याय में भी नंबर वन होने का प्रमाण देगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान को केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना था। समान नागरिक संहिता की बहस को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। पहचान अलग रहे, आस्थाएं अलग रहें, पर नागरिक अधिकारों के सामने हर भारतीय एक समान खड़ा हो।
लेखक सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट हैं।
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