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अब इंसानों से नहीं डर रहे बाघ, लैंटाना झाड़ियों ने बदला शिकार का खेल; CSE रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

Published: Wed, 25 Feb 2026 08:44 PM (IST)

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के अनुसार, इकोसिस्टम खराब होने और मानवीय दखल से बाघ अब इंसानों और ...और पढ़ें

बाघ के हमले से  जनवरी-जून 2025 में 43 लोगों की मौत हुई। फाइल फोटो

बाघ के हमले से  जनवरी-जून 2025 में 43 लोगों की मौत हुई। फाइल फोटो

HighLights

  1. इकोसिस्टम खराब होने से बाघों का व्यवहार बदला, मानव-संघर्ष बढ़ा।

  2. लैंटाना झाड़ियाँ बाघों को छिपने, मवेशियों का शिकार करने में सहायक।

  3. जनवरी-जून 2025 में 43 मौतें; सामुदायिक संरक्षण जरूरी।

संजीव गुप्ता, नीमली (अलवर)। देश के राष्ट्रीय पशु बाघ के व्यवहार में चिंताजनक बदलाव आ रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की "स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026" रिपोर्ट में कहा गया है कि इकोसिस्टम के खराब होने और इंसानी दखल के कारण बाघ अब इंसानों और जानवरों को तेजी से निशाना बना रहे हैं। यह रिपोर्ट बुधवार को नीमली में "अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026" के दौरान जारी की गई।

इंसानों पर शिकार के बढ़ते मामले

रिपोर्ट के आंकड़े चिंताजनक हैं। जनवरी से जून 2025 के बीच, भारत में बाघों के हमलों में 43 लोगों की मौत हुई। एक्सपर्ट इसे "चिंताजनक" मानते हैं क्योंकि बाघ आमतौर पर इंसानों पर तभी हमला करते हैं जब उन्हें मजबूर किया जाता है (बुढ़ापे या चोट के कारण)। लेकिन अब, बाघों में इंसानों का डर खत्म हो रहा है।

बेंगलुरु के कंजर्वेशन बायोलॉजिस्ट के. उल्लास कारंत के अनुसार, जंगलों के पास बाघों और बढ़ती इंसानी आबादी के बीच की दूरी कम हो गई है। 20 राज्यों में बाघों के 40 प्रतिशत हैबिटैट में करीब 60 मिलियन लोग रहते हैं, जिससे टकराव बढ़ना तय है।

बाघ: शिकार के नए मैदान

रिपोर्ट का एक दिलचस्प लेकिन गंभीर पहलू "लैंटाना कैमरा" झाड़ियों से जुड़ा है। यह एक हमलावर एलियन पौधा है जिसने देश के 50 प्रतिशत जंगल और चारागाहों पर कब्जा कर लिया है। ये घनी झाड़ियाँ बाघों के छिपने की बेहतरीन जगहें हैं, जिससे जानवरों का शिकार करना आसान हो जाता है। क्योंकि लैंटाना ने कुदरती घास को खत्म कर दिया है, इसलिए हिरण जैसे जंगली जानवर इस इलाके में नहीं आते हैं। वहाँ सिर्फ़ पालतू मवेशी चरते हैं, जिससे बाघों को ज़्यादा कैलोरी वाला खाना मिलता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बाघ

एक्सपर्ट निनाद मुंगी के मुताबिक, बांधवगढ़ और ताड़ोबा जैसे इलाकों में बाघ अब रिज़र्व के बाहर लैंटाना की झाड़ियों में अपना घर बना रहे हैं। हैरानी की बात है कि मवेशियों को मारने पर मिलने वाले मुआवज़े की वजह से, गाँव वाले अब इसका उतना विरोध नहीं करते हैं।

इससे बाघों और इंसानों के बीच की दूरी और कम हो रही है, जो भविष्य में जानलेवा हो सकती है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इस टकराव को रोकने के लिए लोकल कम्युनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन स्ट्रेटेजी अपनाना और बाघों के इलाकों में इंसानी दखल कम करना जरूरी है।

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