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Exclusive: AIIMS दिल्ली में बाल से भी महीन नसों का ऑपरेशन शुरू, कैंसर-डायबिटिक फुट के मरीजों के लिए वरदान

Published: Sat, 19 Sep 2026 09:03 AM (IST)

एम्स दिल्ली में अब सुपर माइक्रोसर्जरी तकनीक से 0.3-0.5 मिमी जितनी बारीक रक्त और लसीका नसों की सर्जरी संभव होगी, ...और पढ़ें

एम्स दिल्ली में सुपर माइक्रोसर्जरी शुरू। फोटो: एआई जनरेटेड

एम्स दिल्ली में सुपर माइक्रोसर्जरी शुरू। फोटो: एआई जनरेटेड

HighLights

  1. एम्स में सुपर माइक्रोसर्जरी से बारीक नसों का उपचार संभव

  2. फाइलेरिया, लिम्फेडिमा, डायबिटिक फुट मरीजों को मिलेगा लाभ

  3. आईसीजी मैपिंग और उन्नत माइक्रोस्कोप का उपयोग किया जाएगा

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। शरीर के अंदर मौजूद बेहद बारीक रक्त और लसीका नसों की सर्जरी अब एम्स में नई तकनीक से संभव होगी। इन नसों का आकार कई बार सिर्फ 0.3 से 0.5 मिलीमीटर होता है, जिन्हें सामान्य माइक्रोसर्जरी से जोड़ना संभव नहीं होता।

एम्स के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न्स सर्जरी विभाग ने सुपर माइक्रोसर्जरी की शुरुआत की है। इसके तहत बाल से तीन से पांच गुना तक पतले टांकों से बेहद छोटी नसों को जोड़ा जाएगा। अब तक छह मरीजों पर यह किया जा चुका है।

सुपर माइक्रोसर्जरी को माइक्रोसर्जरी का सबसे उन्नत स्वरूप माना जाता है। सामान्य माइक्रोसर्जरी में कुछ मिलीमीटर चौड़ी रक्त वाहिकाओं को जोड़ा जाता है, जबकि इसमें 0.8 मिलीमीटर से छोटी नसों पर काम किया जाता है।

कुछ वाहिकाएं 0.3 से 0.5 मिलीमीटर तक की होती हैं। इनके लिए इस्तेमाल होने वाले टांके बाल की एक लट से तीन से पांच गुना तक पतले होते हैं।

इतनी बारीक सर्जरी के लिए अत्याधुनिक और अत्यधिक क्षमता वाले सर्जिकल माइक्रोस्कोप के साथ विशेष रूप से तैयार किए गए बेहद महीन उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।

फाइलेरिया और कैंसर के मरीजों को भी फायदा

AIIMS में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में छह सर्जरी की गईं। इनमें फाइलेरिया से प्रभावित मरीज की लसीका नसों की सुपर माइक्रोसर्जरी शामिल रही।

स्तन कैंसर के उपचार के बाद हाथ में होने वाली सूजन यानी लिम्फेडिमा के उपचार के लिए भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

इसके अलावा लंबे समय से न भरने वाले डायबिटिक फुट के घाव का सुपर माइक्रोसर्जिकल पुनर्निर्माण किया गया। इसमें बेहद पतले त्वचा फ्लैप का इस्तेमाल किया गया।

आईसीजी और अल्ट्रासाउंड से होगी बारीक नसों की पहचान

सुपर माइक्रोसर्जरी में सर्जन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इतनी छोटी रक्त और लसीका नसों की पहचान करना है। इसके लिए कार्यशाला में इंडोसाइनिन ग्रीन (आईसीजी) आधारित इन्फ्रारेड मैपिंग और हाई फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग तकनीक का भी प्रदर्शन किया गया।

इन तकनीकों की मदद से शरीर के भीतर मौजूद बेहद छोटी वाहिकाओं की पहचान और उनकी मैपिंग करने में सहायता मिलती है।

दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ ने दिया प्रशिक्षण

कार्यशाला में सुपर माइक्रोसर्जरी और लसीका पुनर्निर्माण के क्षेत्र में विशेषज्ञ दक्षिण कोरिया के प्रो. जून पियो (जेपी) होंग प्रमुख विशेषज्ञ के रूप में शामिल हुए।

गंगा अस्पताल, कोयंबटूर के डाॅ. हरि वेंकटरमणि और एस्टर अस्पताल, कासरगोड की डाॅ. समरीन जफर भी विशेषज्ञ के रूप में मौजूद रहीं।

एम्स की ओर से प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष सिंघल के साथ डाॅ. शशांक चौहान, डाॅ. शिवांगी साहा और डाॅ. नंदिनी सिंह तंवर ने हिस्सा लिया।

सालाना 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी

एम्स में वर्तमान में सालाना 300 से अधिक माइक्रोसर्जरी की जाती हैं। विभाग के अनुसार सुपर माइक्रोसर्जरी, आईसीजी मैपिंग और हाई फ्रीक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग को उपचार व्यवस्था में शामिल करने से स्तन व अन्य कैंसर के बाद होने वाली समस्याओं, लिम्फेडिमा और डायबिटिक फुट के मरीजों के पुनर्निर्माण उपचार के नए विकल्प उपलब्ध होंगे।

विभाग इन तकनीकों के जरिए भविष्य में डिमेंशिया और माइग्रेन से संबंधित सर्जरी के नए विकल्प विकसित करने की संभावनाएं भी तलाश रहा है।

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