BS-3 वाहनों पर लगेगी तत्काल रोक, 2030 तक BS-4 भी हटाने की सिफारिश; प्रदूषण के खिलाफ दिल्ली सरकार का मेगा प्लान
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक विशेषज्ञ समिति ने वाहनों को लेकर कड़े रोडमैप की सिफारिश की ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर एआई जनरेटेड
HighLights
बीएस-3 वाहनों पर तत्काल प्रतिबंध, बीएस-4 2030 तक हटेंगे।
नए पेट्रोल-डीजल वाहनों की बिक्री सीमित होगी, ईवी को बढ़ावा।
'राइट टू चार्ज' कानून और सड़क धूल नियंत्रण पर जोर।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली एवं एनसीआर में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने वाहनों को लेकर अब तक के सबसे व्यापक और कड़े रोडमैप की सिफारिश की है।
समिति ने बीएस-1, बीएस-2 और बीएस-3 वाहनों को तत्काल हटाने, बीएस-4 वाहनों को 2030 तक तथा बीएस-6 दोपहिया और चारपहिया वाहनों को क्रमश: 2035 और 2040 तक चरणबद्ध तरीके से सड़क से हटाने का प्रस्ताव दिया है।
इसके साथ ही 2026 की सर्दियों से बीएस-4 वाहनों पर दिल्ली सहित एनसीआर में प्रतिबंध का पायलट शुरू करने और अगले वर्ष से इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की सिफारिश की गई है।
18 अगस्त 2026 को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को सौंपी गई अंतरिम रिपोर्ट में समिति ने कहा है कि एनसीआर में सक्रिय और फिटनेस-स्वीकृत वाहनों की संख्या 2.21 करोड़ है, लेकिन इनमें इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या केवल 3.6 लाख यानी 1.6 प्रतिशत है। करीब 57 प्रतिशत वाहन बीएस-4 या उससे पुराने हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक बीएस-1 से बीएस-3 वाहन कुल बेड़े के करीब 30 प्रतिशत हैं, लेकिन पीएम उत्सर्जन में उनका योगदान करीब 74 प्रतिशत है। इसके मुकाबले 41 प्रतिशत से अधिक बीएस-6 वाहन पीएम उत्सर्जन में करीब सात प्रतिशत योगदान करते हैं।
नए वाहनों की बिक्री पर भी सख्ती
समिति ने केवल पुराने वाहनों को हटाने के बजाय नए पेट्रोल-डीजल वाहनों की बिक्री को भी सीमित करने का प्रस्ताव दिया है। दिल्ली एवंएनसीआर में निजी चारपहिया वाहनों की नई बिक्री में शून्य-टेलपाइप-उत्सर्जन (जेडटीई) वाहनों की हिस्सेदारी 2027 में 20 प्रतिशत, 2028 में 45 प्रतिशत, 2029 में 70 प्रतिशत और 2030 में 100 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई है।
वाहन कंपनियों को हर महीने अपनी कुल बिक्री और जेडटीई बिक्री की जानकारी देनी होगी। लक्ष्य पूरा नहीं करने वाली कंपनियों पर नए पेट्रोल-डीजल वाहनों के पंजीकरण पर क्रमश: कड़े प्रतिबंध लगाने का भी सुझाव है।
रिपोर्ट में 2025 में दिल्ली व एनसीआर में पंजीकृत करीब 21.8 लाख नए वाहनों का भी विश्लेषण किया गया है। इनके बढ़ते पीएम उत्सर्जन में मध्यम और भारी मालवाहक वाहनों की हिस्सेदारी 55.3 प्रतिशत, दोपहिया की 15.6 प्रतिशत, यात्री तिपहिया की 12.1 प्रतिशत और बसों की 8.1 प्रतिशत बताई गई है।
2027 से टैक्सी-डिलीवरी वाहन इलेक्ट्रिक
नए वाहनों के लिए समिति ने 1 अप्रैल 2027 से परिवहन क्षेत्र के तिपहिया, दोपहिया टैक्सी एवं डिलीवरी वाहनों और हल्के मालवाहक वाहनों को जेडटीई करने का प्रस्ताव दिया है।
चारपहिया टैक्सी के लिए यह लक्ष्य 1 अप्रैल 2028, मध्यम-भारी बसों के लिए 1 अप्रैल 2028, मध्यम मालवाहक वाहनों के लिए 1 जनवरी 2031 और भारी मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2032 रखा गया है। निजी चारपहिया के लिए 1 जनवरी 2031 का लक्ष्य सुझाया गया है।
सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में जहां तकनीकी रूप से संभव हो, 1 अप्रैल 2027 से केवल जेडटीई वाहन खरीदने, किराये पर लेने या अनुबंधित करने की सिफारिश है। सभी नगर सेवाओं को 1 अप्रैल 2030 तक जेडटीई वाहनों में बदलने तथा निर्माण वाहनों और उपकरणों को 1 अप्रैल 2028 तक शून्य-उत्सर्जन तकनीक में लाने का सुझाव दिया गया है।
चार्जिंग को नागरिक अधिकार बनाने की तैयारी
समिति ने दिल्ली एवं एनसीआर में ‘राइट टू चार्ज’ कानून बनाने की भी सिफारिश की है। इसके तहत मकान मालिक, किरायेदार और निर्धारित पार्किंग वाले ईवी मालिक को 3, 7 या 11 किलोवाट का चार्जर लगाने का वैधानिक अधिकार देने का प्रस्ताव है। आरडब्ल्यूए या बिल्डर मनमाने तरीके से चार्जर लगाने से रोक नहीं सकेंगे और अलग एनओसी की व्यवस्था खत्म करने की सिफारिश की गई है।
डिस्कॉम को तकनीकी रूप से संभव होने पर 15 दिन के भीतर घरेलू या सामुदायिक चार्जिंग कनेक्शन देने और कम से कम तीन साल तक बिजली की दर आपूर्ति लागत से अधिक नहीं रखने का सुझाव है। जिन आवासीय या कार्यालय परिसरों में व्यक्तिगत पार्किंग नहीं है, वहां कुल पार्किंग क्षमता के कम से कम 20 प्रतिशत हिस्से में साझा चार्जिंग सुविधा विकसित करने की सिफारिश की गई है।
सिर्फ टेलपाइप नहीं, सड़क की धूल पर भी फोकस
समिति ने स्पष्ट किया है कि केवल वाहनों के धुएं को कम करने से पीएम प्रदूषण खत्म नहीं होगा। सड़क की धूल, ब्रेक और टायर से निकलने वाले कणों पर भी कार्रवाई जरूरी है। सभी सड़कों की तत्काल मरम्मत, धूल वाले हाटस्पाट की लगातार निगरानी और नियमित वैक्यूम सफाई व पानी के छिड़काव के मानक बनाने का सुझाव है।
अप्रैल 2027 तक टायर और ब्रेक से होने वाले गैर-निकास उत्सर्जन को कम करने के लिए वाहनों की सामग्री और निर्माण मानकों की समीक्षा की सिफारिश भी की गई है।
2028 से सड़क पर प्रदूषण जांचने वाली तकनीक
समिति ने 1 अप्रैल 2028 से निजी और व्यावसायिक वाहनों के उत्सर्जन की रिमोट सेंसिंग अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। इससे सड़क पर चलते वाहनों के वास्तविक उत्सर्जन की पहचान होगी और मानक से अधिक प्रदूषण करने वाले वाहनों को दोबारा जांच, मरम्मत, पुन: परीक्षण या जरूरत पड़ने पर रिकॉल की प्रक्रिया में लाया जा सकेगा।
कम प्रदूषण वाले क्षेत्र और भीड़भाड़ शुल्क
दिल्ली एवं एनसीआर के अधिक प्रदूषित या अधिक यातायात वाले इलाकों में कम-उत्सर्जन क्षेत्र बनाने का सुझाव दिया गया है। यहां गैर-जेडटीई वाहनों के प्रवेश पर क्षेत्र, समय, मौसम और वाहन श्रेणी के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकेगा।
एएनपीआर कैमरों से ऐसे वाहनों की पहचान, प्रवेश नियंत्रण और शुल्क वसूली की व्यवस्था का प्रस्ताव है। साथ ही पार्किंग क्षेत्र प्रबंधन योजना, अलग-अलग पार्किंग शुल्क और चुनिंदा इलाकों में कंजेशन प्राइसिंग लागू करने की सिफारिश की गई है।
प्रदूषण के बाकी स्रोत भी खत्म करने पर जोर
समिति ने कहा है कि दिल्ली एवं एनसीआर का प्रदूषण केवल वाहनों से नहीं है। कूड़ा जलाने, निर्माण एवं विध्वंस की धूल, उद्योग, बिजली संयंत्र, डीजल जेनरेटर, कोयले से खाना पकाने और गर्म करने तथा पराली और बायोमास जलाने पर भी समानांतर कार्रवाई जरूरी है।
लैंडफिल पर कूड़ा जलाने को पूरी तरह गैरकानूनी बनाने, निर्माण स्थलों को महीन जाल से ढकने, निर्माण सामग्री ढोने वाले वाहनों को पूरी तरह ढकने और निर्माण उपकरणों को 2028 से जेडटीई करने का सुझाव दिया गया है।
डीजल जेनरेटरों की जगह बैटरी ऊर्जा भंडारण और रूफटाप सौर ऊर्जा, कोयला आधारित औद्योगिक हीटिंग की जगह बिजली, तथा कृषि अवशेष प्रबंधन के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर को प्रति सीजन कम से कम 40 हेक्टेयर प्रबंधन का लक्ष्य देने की सिफारिश की गई है।
दस साल में लगभग शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य
समिति ने कहा है कि दिल्ली एवं एनसीआर में प्रदूषण को किसी एक स्रोत पर कार्रवाई करके नहीं सुलझाया जा सकता। अगले दशक में परिवहन, निर्माण, कचरा, उद्योग, बिजली और कृषि समेत सभी प्रमुख क्षेत्रों को शून्य या लगभग शून्य उत्सर्जन की दिशा में ले जाना होगा।
रिपोर्ट के अनुसार एनसीआर में एक्यूआई 460 से अधिक तक पहुंच चुका है और क्षेत्र की करीब छह करोड़ आबादी इससे प्रभावित है। सर्दियों में पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ की सीमा से करीब 35 गुना तक पहुंचने का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया है।
