नई दिल्‍ली, मनीष तिवारी। UP Election News 2022: दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर जब आप दिल्ली से उत्तर प्रदेश में दाखिल होते हैं वहीं स्थित है यूपी गेट। इस यूपी गेट से लखनऊ लगभग पांच सौ किलोमीटर दूर है। इस स्थान की चर्चा हाल-फिलहाल इसलिए रही है, क्योंकि यह भी कुछ उन चुनिंदा जगहों में शामिल है जहां लगभग एक माह पहले तक कुछ सौ प्रदर्शनकारी तीन कृषि कानूनों के विरोध में धरने पर बैठे थे, ठीक उस एक्सप्रेसवे पर जो वर्षों पुरानी समस्याओं से राहत देने के लिए बनकर तैयार होते ही इस्तेमाल में आया भर था। इस कारण लाखों लोगों की लगभग एक साल तक राह रुकी रही। विरोध कृषि कानूनों का था और जो लोग वहां बैठे थे उन्हें किसान बताया गया। किसान शब्द हमारे देश की हर राजनीतिक चर्चा में अवश्य आता है। आप राजनीति पर बोलते हुए दस-पांच वाक्यों में भी इससे बच नहीं सकते और ज्यादातर लोग इस समुदाय से सहानुभूति जताते हैं, उनके हित चिंतन की वकालत करते हैं।

अब जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो यह सवाल भी सामने है कि क्या यूपी गेट से कोई राजनीतिक राह भी निकलने जा रही है? क्या आसपास के तीन जिलों- गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और हापुड़ में यूपी गेट के घटनाक्रम का कोई प्रभाव होगा? क्या किसान एक वोट बैंक हैं? क्या वे समूह के रूप में मतदान भी करते हैं? इन तीन जिलों और शेष पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका कितना राजनीतिक प्रभाव हो सकता है?

इन सवालों का जवाब दस मार्च को मिलेगा जब विधानसभा चुनावों के नतीजे आएंगे, लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि किसानों के कर्णधार होने का दावा करने वाले भी यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि यह चुनाव उनके लिए जनमत परीक्षण जैसा है। वे नतीजों की अपने तरीके से व्याख्या करेंगे और हर स्थिति को अपनी जीत के रूप में बताएंगे। कुछ किसान संगठन पंजाब में सीधे विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस या उस पार्टी का विरोध करने की बातें सुनने को मिल रही हैं। इस क्षेत्र में भारतीय किसान यूनियन और उसके नेता राकेश और नरेश टिकैत सबसे अधिक सक्रिय रहे हैं। अगर उनके साथ वोट बैंक के रूप में किसानों का समर्थन होता तो वे इस चुनाव को अपने लिए जनमत परीक्षण बनाने में देरी नहीं करते और अपनी छोटी सी जीत को भी ऐतिहासिक परिवर्तन बता देते।

किसानों के मामले में यह एक सच्चाई है और राजनीतिक दल भी इससे परिचित हैं कि वे एक समूह नहीं हैं, बल्कि ठीक उसी तरह जातियों और उपजातियों में बंटे हैं जिस तरह अन्य जातियां। उत्तर प्रदेश में हाल में हुए पंचायत चुनावों में गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर अथवा हापुड़ और यहां तक कि आसपास के जिलों में भी ऐसे नतीजे देखने को नहीं मिले जिनके आधार पर यह कहा जाए कि वास्तविक किसानों ने कृषि कानूनों के विरोध में अपने असंतोष और असहमति का प्रदर्शन किया। राज्य के अन्य इलाकों की तरह यहां भी गांवों में जाति और बिरादरी ही हावी रही। प्रत्याशियों में अपना-पराया देखा गया। उस पर भरोसा किया गया जो सबसे अधिक स्वीकार्य था। विजयी लोगों में उनका ही वर्चस्व था जो उस क्षेत्र में संख्या बल में भी आगे थे।

किसान कभी भी इस आधार पर वोट नहीं देते कि हम सब किसान हैं। अगर वे ऐसा करते होते तो शायद इतनी समस्याओं से नहीं घिरे होते। अपनी स्थिति में बदलाव के प्रयासों का विरोध होते देख खुद चौकन्ने हो जाते। उनके लिए अभी भी वक्त है सुधार की राह अपनाने का। जमीनी धरातल पर उन्हें अपना हित चिंतन स्वयं करना चाहिए। वे अपने हिसाब से मतदान भी करें, प्रत्याशी के गुण-दोष को जांचें-परखें। किसी के कहने के बजाय उन्हें अपने आपको सुनना चाहिए। एक ऐसे प्रदर्शन को जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी दूसरों के अधिकारों का हनन माना, उससे अगर चुनावी परिदृश्य प्रभावित हो सकता है तो शायद केवल इस आधार पर कि जो लोग रास्तों के बैरियर से उलझे, अपने काम-धंधों को चौपट होते देखते रहे, बेबस होकर अपना समय बर्बाद करते रहे, वे सभी अपने कष्टों का हिसाब मांगेंगे। ऐसे लोगों में जाट, गुर्जर, यादव, ब्राह्मण, वैश्य और दलित भी शामिल हैं। संयोग से इनमें तमाम असली किसान भी हैं। उन्हें पता है कि उनके नाम पर कैसी सियासत हुई है और किस तरह उन्हें जानबूझकर वोट बैंक बनाने की कोशिश की गई है। किसान अपने अवसर की प्रतीक्षा कर सकते हैं, लेकिन वे शायद ही किसी के राजनीतिक उद्देश्यों का मोहरा बनने के लिए तैयार हों। वे सरल हैं और स्वावलंबी बनना चाहते हैं।

Edited By: Sanjay Pokhriyal