नई दिल्ली [रणविजय सिंह]। फिल्म 'थ्री इडियट्स' तो आपने देखी ही होगी, जिसमें जुगाड़ से प्रसव कराते दिखाया गया है। कुछ इसी तरह का कमाल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (all india medical science) के चिकित्सकों ने हकीकत में करते हुए स्मार्ट फोन की रोशनी में गंभीर बीमारी से पीडि़त एक बच्चे की सांस नली में ट्यूब डालने में सफलता पाई। एम्स की इस जुगाड़ तकनीक को अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल क्रिटिकल केयर में रिपोर्ट की गई है। 

एम्स में तीन माह पहले एक बच्चे को गंभीर हालत में इलाज के लिए लाया गया था। संस्थान के मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अनिमेष राय ने बताया कि उसे एक्यूट इंफ्लामेटरी डीमाइलिनेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी (एआइडीपी) नामक बीमारी थी। बच्चे का शरीर पैरालाइज हो गया था और हाथ-पैर कमजोर हो गए थे। वह ठीक से सांस तक नहीं ले पा रहा था। टाइप-2 रेस्पिरेटरी फेल्योर के कारण उसका श्वसन तंत्र ठीक से काम नहीं कर पा रहा था, जिससे शरीर में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ गई थी। उसे सघन चिकित्सा कक्ष (आइसीयू) में लंबे समय के लिए वेंटिलेटर सपोर्ट देना जरूरी था। ऐसा करने के लिए पहले उसके गले में एक ट्यूब डालने की जरूरत थी, जिसे ऑक्सीजन की ट्यूब से जोड़ा जा सके।

आइसीयू में ब्रांकोस्कोप की मदद से यह प्रोसिजर शुरू किया गया। इसी बीच अचानक ब्रांकोस्कोप से जुड़ा बल्ब फ्यूज हो गया। यह तब हुआ जब ब्रांकोस्कोप व निडिल मरीज की सांस की नली के अंदर था। बल्ब फ्यूज होने से डॉक्टर सांस की नली के अंदर की स्थिति नहीं देख पा रहे थे। अब डॉक्टरों के सामने दो ही विकल्प था। या तो वे प्रोसिजर बीच में ही छोड़ दें या फिर ब्रांकोस्कोपी की मदद के बगैर ही सर्जरी से ट्यूब डालें। लेकिन, ब्रांकोस्कोपी की ट्यूब को निकालने से भी मरीज को परेशानी हो सकती थी, इसलिए डॉक्टरों ने तीसरा रास्ता अपनाया। उन्होंने लाइट के स्रोत से जुड़े ब्रांकोस्कोपी के ट्यूब को निकालकर पास मौजूद मोबाइल फोन की फ्लैश लाइट के पास फिक्स कर दिया। इससे रोशनी गले के अंदर जाने लगी।

डॉ. अनिमेषराय ने बताया कि मोबाइल की फ्लैश लाइट काफी मददगार साबित हुई और प्रोसिजर पूरी तरह से सफल रहा। वह मरीज 20 दिनों तक आइसीयू में रहा और स्वास्थ्य में सुधार होने पर बाहर निकलने में कामयाब रहा।  

Posted By: JP Yadav

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