नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। कोरोना के दौरान म्यूकोरमाइकोसिस का फंगल संक्रमण भी मरीजों के लिए बेहद घातक साबित हुआ है। खास तौर पर उन मरीजों के लिए जिनमें यह फंगल संक्रमण नाक, आंख के अलावा मस्तिष्क के हिस्से तक पहुंच गया था। ऐसे गंभीर संक्रमण से पीडि़त 22 फीसद मरीजों की मौत हो गई। गंगाराम अस्पताल के डाक्टरों द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। खास बात यह है कोरोना के संक्रमण के बाद पहले की तुलना में म्यूकोरमाइकोसिस के संक्रमण में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई। गंगाराम अस्पताल में पिछले चार माह में म्यूकोरमाइकोसिस के संक्रमण से पीडि़त 175 मरीज ऐसे देखे गए, जिनके नाक, आंख व मस्तिष्क में फंगल संक्रमण पहुंच गया था। जिसे राइनो-आर्बिटो-सेरेब्रल म्यूकोरमाइकोसिस (आरओसीएम) कहा जाता है।

अस्पताल के नेत्र चिकित्सा विभाग के चेयरमैन डा. एके ग्रोवर ने कहा कि कोरोना से पहले एक दशक में आरओसीएम के 40 मामले देखे गए थे। इस तरह हर साल औसतन चार मामले देखे जाते थे। जबकि कोरोना की दूसरी लहर के बाद चार माह में ही 175 मरीज देखे जा चुके हैं। मरीजों की औसतन उम्र 50 वर्ष थी। 121 मरीज मधुमेह से पीडि़त थे। कोरोना के इलाज के दौरान 80 फीसद मरीजों को स्टेरायड दवा दी गई थी। उन्होंने कहा कि इलाज के दौरान 121 मरीजों के नाक व साइनस की सर्जरी की गई। वहीं 26 मरीजों की सर्जरी कर आंख हटानी पड़ी पड़ी। अस्पताल से 102 मरीजों को छुट्टी दी जा चुकी है। वहीं 38 मरीजों की मौत हो गई।

अस्पतालों में अब ज्यादा नहीं आ रहे मरीज

अस्पतालों में म्यूकोरमाइकोसिस के मरीज तो अब भी भर्ती हैं, लेकिन राहत की बात यह है कि नए मरीज ज्यादा नहीं आ रहे हैं। पुराने मरीज ही दूसरे अस्पतालों से बड़े अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। गंगाराम अस्पताल के ईएनटी विभाग के विशेषज्ञ डा. अजय स्वरूप ने कहा कि अभी अस्पताल में करीब 30 मरीज भर्ती हैं। नए मामले नहीं आ रहे हैं। कभी कभी एक-दो मरीज दूसरे अस्पतालों से स्थानांतरित कर लाए जाते हैं। लोकनायक अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डा. सुरेश कुमार ने कहा कि म्यूकोरमाइकोसिस के अब एक-दो मरीज ही आते हैं। इस बीमारी का इलाज लंबा चलता है। मरीजों को एक से डेढ़ माह तक भर्ती रखना पड़ता है। इस वजह से करीब 60 मरीज भर्ती हैं।

Edited By: Vinay Kumar Tiwari