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एनसीआर आतंकियों के लिए बना 'सुरक्षित पनाहगाह', ISI ब्रेनवॉश कर बना रहा स्लीपर सेल की फौज; एजेंसियां सतर्क

Published: Thu, 19 Mar 2026 08:32 PM (IST)

एनसीआर आतंकी संगठनों का नया ठिकाना बन रहा है, जहाँ आईएसआई युवाओं को ब्रेनवॉश कर स्लीपर सेल बना रही है। ...और पढ़ें

बीते कुछ महीने में कई आतंकियाें के पकड़े जाने व उनसे पूछताछ में सामने आए तथ्यों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

बीते कुछ महीने में कई आतंकियाें के पकड़े जाने व उनसे पूछताछ में सामने आए तथ्यों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

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संक्षेप में पढ़ें

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। एनसीआर एक बार फिर विभिन्न आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं। पिछले सप्ताह गाजियाबाद से हुई आईएसआई समर्थित छह आतंकियों की गिरफ्तारी व इससे पहले बीते फरवरी में भी आईएसआई समर्थित एक बांग्लादेशी माॅड्यूल का भंडाफोड़ होने से यह साफ है कि आतंकियों के लिए एनसीआर मुफीद ठिकाना बन रहा है। आतंकी एनसीआर को अपनी गतिविधियों के लिए 'सुरक्षित पनाहगाह' के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। बीते कुछ महीने में कई आतंकियाें के पकड़े जाने व उनसे पूछताछ में सामने आए तथ्यों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती

हालांकि, एनसीआर की पुलिस के अलावा स्पेशल सेल और एनआईए की सक्रियता से अब तक कई बड़े हमलों की साजिश को नाकाम कर दिया गया है। प्लानिंग के स्तर पर ही आतंकियों के स्लीपर सेल को पकड़ कर उनके मंसूबों को ध्वस्त तो कर दिया गया लेकिन एक के बाद कई आतंकियों के पकड़े जाने का मामला सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

गैंगस्टर लाॅरेंस से जोड़ने के नाम पर जोड़ा भटके युवाओं को

स्पेशल सेल के एक अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई पिछले कुछ समय से तीन तरह के नेटवर्क पर काम कर रही है। इनमें पहला टेरर नेटवर्क, दूसरा गैंगस्टर व तीसरा इंटरनेट मीडिया नेटवर्क है। गाजियाबाद में पकड़े गए आतंकियों को आईएसआई ने सोशल मीडिया के जरिये ब्रेनवाश कर जोड़ा था। आईएसआई इंटरनेट के जरिए ऐसे युवाओं को जोड़ने का काम करती है, जो नशे के आदी होते हैं। पकड़े गए सभी युवा नशे के आदी हैं, इन्हें गैंगस्टर लाॅरेंस से जोड़ने के नाम पर जोड़ा गया था।

एनसीआर के शहरी जाल में छिपना आसान 

स्पेशल सेल और सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो एनसीआर आतंकियों के निशाने पर होने और उनकी गतिविधियों का केंद्र बनने के कई मुख्य कारण हैं।

इनमें पहला शहरी फैलाव और घनी आबादी है। दिल्ली के साथ जुड़े नोएडा, ग्रेटर नाएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे शहर एक विशाल और जटिल शहरी जाल बनाते हैं जहां प्रवासियों की भारी संख्या के बीच किसी अजनबी के लिए पहचान छिपाना बहुत आसान होता है।

इन इलाकों में किराए के मकानों की बहुतायत है जिससे पुलिस सत्यापन के बिना या फर्जी दस्तावेज पर किसी को भी आसानी से कमरे मिल जाता है। पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह एक बड़ी समस्या है, जिसका फायदा 'स्लीपर सेल' उठाते हैं।

आतंकियों के 'प्रपोगेंडा' को मजबूती

आतंकी संगठनों का मुख्य उद्देश्य डर फैलाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचना होता है। एनसीआर में आतंकी गतिविधि से आतंकी संगठनों को इसका फायदा मिलता है। संसद भवन, लाल किला, दूतावास और मेट्रो जैसे महत्वपूर्ण स्थान दिल्ली में हैं जो आतंकी संगठनों के साफ्ट और हार्ड टारगेट्स होते हैं। बीते नवंबर में लाल किले के पास हुआ कार विस्फोट इसी रणनीति का हिस्सा था। दिल्ली में होने वाली छोटी सी घटना भी वैश्विक सुर्खियां बनती है, जो आतंकियों के 'प्रपोगेंडा' को मजबूती देती है।

अब आतंकी केवल अनपढ़ या गुमराह युवा नहीं

एनसीआर देश का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट हब है। यहां मेट्रो, अंतरराज्यीय बसें और रेलवे नेटवर्क के कारण आतंकी एक राज्य से दूसरे राज्य में मिनटों में दाखिल हो जाते हैं, जिससे पुलिस की कार्यक्षेत्र की सीमाएं उनके लिए ढाल बन जाती हैं।

मध्य प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ इलाकों से अवैध हथियारों की धड़ल्ले से तस्करी होने से आतंकियों को आसानी से अवैध हथियार व गोला बारूद मिल जाते हैं। पिछले दिनों जैश के सफेदपोश डाॅक्टर माॅड्यूल के पकड़े जाने से यह पता चलता है कि अब आतंकी केवल अनपढ़ या गुमराह युवा नहीं हैं।

छोटे-छोटे 'माॅड्यूल्स' तैयार कर रहे 

आतंकी सगठनों से डाॅक्टर, इंजीनियर और साॅफ्टवेयर विशेषज्ञों की संलिप्तता भी पाई गई है (जैसे फरीदाबाद के एक विश्वविद्यालय से जुड़े डाक्टर का मामला)। एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स और डार्क वेब के जरिए सीमा पार बैठे आकाओं से निर्देश लेना और स्थानीय स्तर पर बिना किसी शक के काम करना आसान हो गया है।

इंटेलिजेंस इनपुट्स के अनुसार, पाकिस्तान की आइएसआइ और अब बांग्लादेश आधारित कुछ कट्टरपंथी गुट दिल्ली-एनसीआर में छोटे-छोटे 'माॅड्यूल्स' तैयार कर रहे हैं। बड़े आतंकी हमलों के बजाय अब 'लोन वुल्फ' अटैक या छोटे बम धमाकों की रणनीति अपनाई जा रही है, जिन्हें ट्रैक करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए अधिक कठिन होता जा रहा है।

हथियार और रसद मुहैया करा रहे 

नवंबर में लाल किले के पास हुए कार बम धमाके के बाद से एजेंसियां लगातार छापेमारी कर रही हैं। इस मामले में अब तक 11 से अधिक आतंकियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच में सामने आया था कि 3200 किलो अमोनियम नाइट्रेट फरीदाबाद में इकट्ठा किया गया था।

यह भी पता चला कि इस हमले का मास्टरमाइंड एक उच्च शिक्षित पेशेवर (डाॅक्टर) था, जिसे सीमा पार बैठे हैंडलर्स ने रेडिकलाइज किया था। फरवरी में ही एनआईए ने दो और आतंकियों को दबोचा था, जो इस नेटवर्क को हथियार और रसद मुहैया करा रहे थे।

निशाने पर धार्मिक स्थल

फरवरी के अंत में स्पेशल सेल ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी माॅड्यूल का पर्दाफाश कर आठ आतंकियों को गिरफ्तार किया था जिनमें अधिकांश बांग्लादेशी नागरिक थे। ये आतंकी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाकों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने की फिराक में थे। इनके तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और बांग्लादेश स्थित हैंडलर शब्बीर अहमद लोन से जुड़े पाए गए थे।

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