गुरुग्राम [सतीश राघव]। देश की आन-बान-शान के लिए मर मिटने वालों में भोंडसी निवासी सूबेदार कंवरपाल सिंह राघव का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। उन्हें 26 मई 2013 में संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से सूडान में भेजी गई भारतीय शांति सेना में शामिल किया गया था। सूडान जाने से पहले वह पंद्रह दिनों के लिए छुट्टी पर घर आए थे। ड्यूटी पर जाते वक्त उन्होंने पत्नी से कहा था कि जिंदगी रहेगी तो फिर मिलेंगे नहीं तो तिरंगे में लिपट कर आएंगे। स्नेहलता को गर्व है कि उनके पति ने देश की ओर से दी गई जिम्मेदारी को निभाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।

दुश्मनों को किया ढेर

कंवरपाल दस जून 1986 में सेना में भर्ती हुए थे। पहली नियुक्ति जम्मू-कश्मीर में हुई। पाकिस्तान की ओर से अघोषित युद्ध में उन्होंने कई बार दुश्मनों को ढेर किया। बहादुरी के बल पर वह प्रमोशन पाते गए और सूबेदार बन गए। पराक्रम व बेहतर सैन्य संचालन को देखते हुए उनकी नियुक्त सूडान जाने वाली शांति सेना में हुई। घर पर पंद्रह दिनों की छुट्टी काटने के बाद सूबेदार अपनी टुकड़ी के साथ मई 2013 को सूडान पहुंच गए। वहां आतंरिक विद्रोह करने वालों के खिलाफ शांति सेना लड़ रही थी।

कंवरपाल के सीने में आठ गोलियां लगीं

19 दिसंबर 2013 को सूडान के अकोबो जोईलेई प्रांत के टीओबी शिविर में शरण लिए हुए एक जाति विशेष के लोगों को मारने के लिए विद्रोहियों ने देर रात हमला बोला। शिविर में शरण लेने वालों की जान बचाने के लिए कंवरपाल के नेतृत्व में जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। हमलावर हजारों की संख्या में थे और उनसे मुकाबले के लिए मुट्ठी भर जांबाज। मुकाबला करते हुए कंवरपाल के सीने में आठ गोलियां लगीं और वह शहीद हो गए।

बेटा भी सेना में हो भर्ती

स्नेहलता राघव कहती हैं कि मेरे पति ने देश का नाम रोशन किया। बेटे से भी यही उम्मीद करती हूं कि वह सेना में भर्ती हो। जब वह शहीद हुए तो बेटी अंजलि व बेटा कुणाल छोटे थे। मां ने बच्चों का अच्छी तालीम दिलाई। बेटी सरकारी नौकरी में है। बेटा 12वीं के साथ एनडीए की तैयारी कर रहा है। 

Posted By: Amit Mishra