यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 04, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Lockdown: पर्यावरण में स्थायी सुधार के लिए कार्य संस्कृति में हो बदलावः सुनीता नारायण
Coronavirus lockdown संजीव गुप्ता ने जानी-मानी पर्यावरणविद सुनीता नारायण से लंबी बातचीत की।

नई दिल्ली। लॉकडाउन के चलते दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, देश के हर शहर में इन दिनों साफ हवा चल रही है। प्रदूषण का कहीं नामोनिशान नहीं है। हर कोई खुलकर सांस ले रहा है। श्वास रोगियों की तकलीफ भी नियंत्रण में है। आसमान एकदम नीला है तो दूरदराज तक सब कुछ साफ दिखाई देने लगा है। देश भर से प्रदूषणमुक्त वातावरण के अद्भुत फोटो और वीडियो सामने आ रहे हैं।
लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी प्रदूषण को नियंत्रण में रखना समय की आवश्यकता बन चुका है। इसके गंभीर परिणामों को देखते हुए ठोस उपाय करने ही होंगे, लेकिन क्या और कैसे, इसी मुद्दे पर संजीव गुप्ता ने जानी-मानी पर्यावरणविद सुनीता नारायण से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :
पर्यावरण में जो सुधार सालों में नहीं हो पाया, लॉकडाउन में हो गया। इस सुधार को किस रूप में देखती हैं आप?
इसमें कोई संदेह नहीं कि लॉकडाउन ने लोगों को भले ही घरों में कैद कर दिया हो, लेकिन हवा को प्रदूषण से बिल्कुल मुक्त कर दिया है। सुबह- शाम के अति व्यस्त घंटों में भी इन दिनों हवा एकदम साफ चल रही है। प्रमुख प्रदूषक तत्व पीएम 2.5 एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ 2) में भी 75 फीसद तक कमी हो गई है। यहां तक कि मृतप्राय: यमुना को भी जैसे फिर से जीवन मिल गया है। गंगा का पानी भी बिल्कुल साफ नजर आ रहा है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सब तब हुआ है जब अर्थव्यवस्था के साथ ही जिंदगी भी ठहर सी गई है।
..तो क्या वायु और जल प्रदूषण में हुआ यह अभूतपूर्व सुधार सुकून देने वाला नहीं है?
बिल्कुल है। हम तो चाहते हैं कि हवा हमेशा ही इतनी साफ रहे, लेकिन कोविड-19 जैसी महामारी की कीमत पर बिल्कुल नहीं। ऐसा प्लान बने और उस पर इस तरह अमल हो कि किसी बाध्यता के बिना भी हम खुलकर सांस लेते रहें।
प्रदूषण कम करने के लिए अब तक जो कार्ययोजनाएं बनती रही हैं, क्या वे कारगर नहीं हैं?
ऐसा भी नहीं है। कार्ययोजनाएं बनती रही हैं, उन पर काम भी हुआ है। तभी तो हम लोग पहले की तुलना में थोड़ा- बहुत ही सही, लेकिन सुधार कर पाए हैं। दिल्ली के वायु प्रदूषण में भी 25 फीसद तक सुधार देखने में आया है, लेकिन योजनाओं में व्यावहारिकता लाना भी जरूरी है। मसलन, ऑड-इवेन से हम कुछ कारों को भले ही सड़कों पर आने से कम कर देते हों, लेकिन दोपहिया वाहन उतने ही ज्यादा बढ़ जाते हैं। इसी तरह औद्योगिक प्रदूषण पर भी लगाम नहीं लग पा रही है।
किस तरह के उपायों से मौजूदा सुधार आगे भी बरकरार रह सकता है?
सबसे पहले तो यह तय करना जरूरी है कि हमें लोगों को नहीं, बल्कि सड़कों पर अनियंत्रित संख्या में उतरने वाले वाहनों को लॉक करना है। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली मजबूत होगी, तभी निजी वाहन कम होंगे। सभी ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों को कोयले से हटाकर गैस पर लाना होगा। इसी तरह औद्योगिक इकाइयों को भी स्वच्छ ईंधन में शिफ्ट करना होगा। स्वच्छ ईंधन मसलन सीएनजी से जीएसटी हटाना भी जरूरी है। औद्योगिक कचरा कम होगा तो नदियों को भी नया जीवन मिल सकेगा।
आपको क्या लगता है कि पर्यावरण में सुधार के लिए लॉकडाउन वरदान है?
देखिए, यह लॉकडाउन भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है जिसे कोई भी दोहराना नहीं चाहेगा। इससे पर्यावरण के हर क्षेत्र में सुधार अवश्य हुआ हो, लेकिन कड़वा सच यह भी है कि इसकी हमें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। कोविड-19 हमारे जीवन की सबसे अधिक घातक एवं विनाशकारी घटना है।
लॉकडाउन के मद्देनजर पर्यावरण में हुए सुधार पर लोगों को क्या संदेश और सलाह देना चाहेंगी?
प्रकृति की पुकार सुननी और समझनी चाहिए। हमें तात्कालिक आवश्यकताओं पर ही नहीं, भविष्य की जरूरतों को भी ध्यान में रखना चाहिए। अपनी कार्यसंस्कृति और जीवनशैली में बदलाव लाना चाहिए। कोरोना संकट की सीख ही भविष्य के सुधार का आधार बनेगी। आर्थिक प्रगति के पथ पर प्रकृति की अनदेखी भारी पड़ सकती है। सभ्यता के विकास संग हमें प्रकृति का भी ध्यान रखना चाहिए।
