नई दिल्ली। देश की पहली रैपिड रेल दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ के बीच महज एक साल के अंतराल पर चलने वाली है। पूरे कारिडोर पर भले ही यह 2025 में चले, लेकिन 17 किमी के प्राथमिकता खंड पर मार्च 2023 में दौड़ने लगेगी। दिल्ली-एसएनबी (शाहजहांपुर-नीमराना-बहरोड़) कारिडोर पर भी काम शुरू हो गया है और दिल्ली-पानीपत कारिडोर की डीपीआर स्वीकृति के चरण मे है। आखिर कैसा होगा रैपिड रेल का सफर, किस तरह यह दिल्ली एनसीआर को और करीब लाएगी तथा कोरोना काल में भी किस तरह इसका परिचालन समय पर संभव हो पाएगा। ऐसे ही कुछ सवालों को लेकर संजीव गुप्ता ने एनसीआर परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक विनय कुमार सिंह से विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

-रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) के बारे में विस्तार से बताएं कि यह क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम के विकास के पीछे हमारा ²ष्टिकोण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के करोड़ों लोगों के लिए एक तेज, आरामदायक और सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन साधन प्रदान करके उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाना है। आरआरटीएस एक नई रेल आधारित प्रणाली है जो दिल्ली को मेरठ, अलवर और पानीपत जैसे क्षेत्रीय नोड्स से गति के साथ जोड़ेगी और वर्तमान यात्रा समय को एक तिहाई कर देगी। आरआरटीएस पारंपरिक रेलवे और मेट्रो से अलग है। यह यात्रियों को तेज रफ्तार और कम स्टापेज के साथ लंबी दूरी की यात्रा करने की सुविधा प्रदान करेगा। आरआरटीएस के तीनो कारिडोर भी इंटरओपरेबल बनाए जा रहे हैं, जिससे यात्रियों को एक कारिडोर से दूसरे कारिडोर में जाने के लिए ट्रेन बदलने की जरूरत नहीं होगी। आरआरटीएस स्टेशनों का परिवहन के अन्य साधनों जैसे मेट्रो स्टेशनों, बस डिपो, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशनों के साथ एकीकरण भी किया जा रहा है।

इतने बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण में पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

रैपिड रेल का परिचालन ट्रैफिक के साथ-साथ प्रदूषण में कमी लाएगा। इसीलिए इसे केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु अभियान (एनसीएपी) का हिस्सा भी बनाया गया है। इसके परिचालन में सड़क पर चलने वाले वाहनों की तुलना में सिर्फ 1/5 ईंधन की खपत होगी। इलेक्टि्रक ट्रैक्शन द्वारा परिचालित आरआरटीएस एनसीआर में परिवहन का एक ग्रीन मोड होगा। इससे सार्वजनिक परिवहन उपयोग की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत से बढ़कर 63 प्रतिशत हो जाने और सड़कों पर लगभग एक लाख से अधिक निजी वाहन घटने का अनुमान है। कारिडोर के निर्माण में स्थानीय निवासियों को होने वाली असुविधा को कम करने, साइटों के आसपास सुचारू यातायात सुनिश्चित करने और प्रदूषण नियंत्रण के लिए नए जमाने की तकनीकों का प्रयोग भी किया जा रहा है। सभी प्रकार के निर्माण कार्य बैरिकेडिंग जोन में ही किए जा रहे हैं, एंटी-स्माग गन और वाटर स्पि्रंकलर का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

कोविड के कारण पिछले दो वर्ष चुनौतीपूर्ण रहे हैं। ऐसे में परियोजना को समय से पूरा करने के लिए एनसीआरटीसी ने क्या प्रयास किए?

कोविड-19 के कारण कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है जिसमें रा मैटेरियल की कमी, आपूर्ति श्रृंखला का टूटना, मजदूरों का पलायन आदि शामिल हैं। हमने आनलाइन प्री-बिड मीटिंग जैसी गतिविधियां भी की, जिन्होंने ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए उच्च बेंचमार्क स्थापित किया। साहिबाबाद से दुहाई तक पांच स्टेशनों सहित 17 किमी लंबे प्राथमिकता खंड का परिचालन 2023 तक करने का लक्ष्य है। केंद्र और राज्य सरकारों के पूर्ण सहयोग से एनसीआरटीसी टीम के 14000 से ज्यादा श्रमिक और 1100 से ज्यादा इंजीनियर दिनरात काम कर रहे हैं।

-रैपिड रेल का परिचालन दिल्ली और एनसीआर के शहरों को समीप कैसे लाएगा?

रैपिड रेल सफर की दूरी को बहुत ही कम समय में तय करवाएगी। मसलन, दिल्ली से मेरठ का सफर 60 मिनट से भी कम समय में पूरा हो जाएगा। इसके अलावा यह एनसीआर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच को आसान करेगी। लाखों छात्रों और नौकरीपेशा वर्ग को सार्वजनिक परिवहन द्वारा यात्रा का तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक साधन मिलेगा। इसके परिचालन से एनसीआर क्षेत्र में औद्योगिक निवेश के साथ-साथ रोजगार सृजन में भी वृद्धि होगी।

-आरआरटीएस के निर्माण के लिए मेक इन इंडिया के तहत क्या कदम उठाए गए हैं?

अत्याधुनिक कंप्यूटर केंद्रित सुविधाओं से लैस आरआरटीएस के 100 प्रतिशत ट्रेनसेट गुजरात के सावली में निर्मित किए जा रहे हैं। आरआरटीएस की 180 किमी प्रति घंटे की डिजाइन गति के लिए ट्रैक सरंचना सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक है और यह मेरठ में निर्मित हो रही है। सिग्नलिंग, टेलिकाम व बिजली संबंधी उपकरण आदि का निर्माण भी भारत में ''मेक इन इंडिया'' पहल के तहत किया जा रहा है। इन सभी के निर्माण में भी 90 प्रतिशत से अधिक स्थानीय उत्पादों/ सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

Edited By: Jp Yadav