नई दिल्ली,जेएनएन। एकीकृत निगम के समय जिस रानी झांसी फ्लाईओवर की नींव रखी गई, उसे वर्ष 2013 में ही शुरू किया जा सकता था। यह दावा खुद निगम की ऑडिट रिपोर्ट का है। रिपोर्ट के अनुसार अगर समय रहते निगम के अधिकारियों और नेताओं ने इस परियोजना में रुचि दिखाई होती तो इसे पांच साल पहले ही जनता को समर्पित कर दिया जाता। बृहस्पतिवार को इस परियोजना से संबंधित ऑडिट रिपोर्ट उत्तरी दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति की बैठक में रखी गई।

रिपोर्ट में साफ लिखा है कि वर्ष 2008 से लेकर 2013 तक निगम के अधिकारियों और नेताओं ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई, जिसकी वजह से यह परियोजना समय से न तो पूरी हो पाई और न ही शुरू हो पाई। वर्ष 2013 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने दखल दिया तब जाकर निगम के अधिकारी और नेता सक्रिय हुए, जिससे बाद निर्माण में गति देखी गई। रिपोर्ट के अनुसार, जिस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर तरह-तरह के दावे के किए जा रहे थे, उसको लेकर वर्ष 2008 से लेकर 2013 तक कोई समीक्षा बैठक नहीं हुई। इतना ही नहीं, इसी अंतराल में फ्लाईओवर के निर्माण के लिए जिन-जिन एजेंसियों के सहयोग की आवश्यकता थी, उनकी कोई समन्वय बैठक तक नहीं हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्य 27 माह में पूरा होना था, लेकिन 10 साल लग गए। भूमि अधिग्रहण में देरी की वजह से यह कार्य बहुत देरी से पूरा हो पाया। इस परियोजना की राशि भी 177 करोड़ से 700 करोड़ पहुंच गई। हालांकि, निगम यह दावा करता रहा है कि इस परियोजना में जिस 700 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही जाती है, वह भूमि अधिग्रहण के लिए दिए जाने वाले मुआवजे के खाते में पड़ी हुई है। वह खर्च ही नहीं हुई। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1995 में इस फ्लाईओवर की परिकल्पना की गई थी।

वर्ष 2004 में इसका डिजाइन एक सलाहकार ने निगम की स्थायी समिति को दिया। इसके बाद 30 जून 2008 को इसका कार्य आदेश जारी किया गया। बृहस्पतिवार को स्थायी समिति ने यह रिपोर्ट निगमायुक्त को भेज दी है और इस पर उनकी टिप्पणी मांगी है। निगम के अनुसार, अभी यह रिपोर्ट केवल प्राथमिक है। अभी इस पर निगम के विभिन्न विभागों के स्पष्टीकरण आने बाकी हैं।