भगवान झा, पश्चिमी दिल्ली। यह आकाशवाणी है... बड़े-बुजुर्गों के जेहन में इन तीन शब्दों के आते ही पुरानी यादें ताजा हाेने लगती है। इसमें रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस जमा करने के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियों व पड़ोसी देशाें के साथ हुए युद्ध के पल-पल की जानकारी लेने का कौतूहल बुजुर्गों की जुबान पर खुद ब खुद आने लगता है। रेडियो की महत्ता की बात करें तो सूचनाएं देने के साथ-साथ यह एक स्टेटस सिंबल भी था और अगर शादी में किसी को रेडियाे मिलता था तो उसकी चर्चा न सिर्फ उनके गांव बल्कि आसपास के गांवों तक महीनों होती रहती थी। 

पद्मश्री से सम्मानित रमाकांत शुक्ल बताते हैं कि रेडियो से हमारे परिवार का पुराना नाता रहा। उस समय रेडियो रखने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था, जिसकी फीस डाकघर में जमा करानी पड़ती थी। उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी पंडित ब्रह्मानंद जी शुक्ल खुर्जा में कार्यरत थे और वहां वे रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम भारत विभूति प्रोग्राम में वक्ता के तौर पर जाते थे। उस समय हमारे पास रेडियो नहीं था। ऐसे में पिताजी को सुनने के लिए पड़ोस में रहने वाले पंडित रामनारायण गौड़ के आवास पर जाते थे।

उस समय रेडियो एक परिवार से दूसरे परिवार को जोड़ने का जरिया बना हुआ था। रेडियो पर किसी कार्यक्रम में शरीक होना बड़ी बात मानी जाती थी। उन्होंने कहा कि मुझे शादी में रेडियो मिला था। उस दौरान इसकी चर्चा महीनों होती रही। द्वारका निवासी अनिल कुमार पाराशर बताते हैं कि, मेरे घर में सबसे पहला रेडियो 1963 में आया। हम लोग विनाका गीत माला हो या फिर विविध भारती कार्यक्रम, बड़े शौक से सुनते थे।

उन्होंने कहा कि 1971 के युद्ध में हमारे बड़े भाई बार्डर पर थे। उस दौरान परिवार के सभी सदस्य रेडियो से चिपके रहते थे। बार्डर के हालात के बारे में जानकारी लेने की उत्सुकता सभी में रहती थी। इसके अलावा समाचार प्रसारण से पहले जो संगीत के धुन की प्रस्तुति होती थी वह भी हमें काफी अच्छा लगता था। उन्होंने कहा कि मेरे पास सोनी कंपनी का 40 वर्ष पुराना रेडियो अभी भी है।

यह हमें बीते दिनों की याद दिलाता रहता है। अब तो सूचना प्राप्त करने के कई साधन हमारे पास हैं लेकिन जो बात रेडियो में थी वह किसी में नहीं है। रेडियो पर प्रस्तुत होने वाले एक-एक कार्यक्रम हमें याद रहते थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि पूरा परिवार एक साथ उन कार्यक्रमों को सुनता था। 

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