यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 20, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
'दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए...'मर्मस्पर्शी भावों को अनाथ कर गए केदारनाथ
केदारनाथ सिंह के निधन से हिंदी साहित्यकारों एवं उनके प्रशंसकों में शोक की लहर है।

नई दिल्ली (अभिनव उपाध्याय)। हिंदी के वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और देश के प्रतिष्ठित पुरस्कार ज्ञानपीठ व साहित्य अकादमी से सम्मानित केदारनाथ सिंह का 84 साल की उम्र में सोमवार को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया। वह पिछले कुछ दिनों से पेट में संक्रमण के कारण बीमार थे।
उपचार के दौरान सोमवार शाम 8 बजकर 40 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। केदारनाथ सिंह के निधन से हिंदी साहित्यकारों एवं उनके प्रशंसकों में शोक की लहर है। केदारनाथ सिंह अपने पीछे परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को लोधी रोड श्मशान घाट पर होगा।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में साल 1934 में जन्मे केदारनाथ सिंह नई कविता के अग्रणी कवियों में शुमार रहे थे व हिंदी कविता में नए बिंबों के प्रयोग के लिए जाने जाते थे। उनकी कविताएं जटिल विषयों को सहज एवं सरल भाषा में व्यक्त करती हैं। केदारनाथ सिंह सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवि थे। उनकी कविता में देशजता, संबंधों की सहजता और प्रतीकों के सुघड़ प्रयोग पाठकों के हृदय में बस जाते हैं। उनकी छोटी लेकिन अंतर्मन को छूती कविता....
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए...
एक मानवीय मर्म को जहा स्पर्श करती है वहीं एक उम्मीद भी जगाती है। उनके व्यक्तित्व की सादगी उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है। इस कारण जीवन की जटिलताएं उनके सम्मुख अपनी समूची वास्तविकता में अर्थवान हो उठती हैं, इसलिए उनकी कविता में सुदीर्घ भारतीय जीवन बोध विश्वसनीय स्वरूप में जीवंत हो उठता है। जीवन के प्रति गहरे राग बोध की कभी न समाप्त होने वाली पूंजी उनके काव्य को आम जन के बीच लोकप्रिय बनाती है।
साहित्यकारों की प्रतिक्रिया
केदारनाथ सिंह ने बहुत सुघर, सुगठित कविता लिखी। ऐसी कविता शायद किसी और दूसरे समकालीन कवि ने नहीं लिखी। उनकी कविता में गांव घर, जवानी की स्मृतियां उनकी कविता में बार बार आती थी। उनकी गीति परकता उनकी कविता में मानवीयता को समृद्ध करती थी। और उनके बहुत अनुवाद भारतीय और फ्रेंच भाषा मे अनुवाद हुए हैं। वह बहुत छोटे गांव से आये थे। जेएनयू में प्राध्यापक रहे। दिल्ली में कई वर्ष रहने के बाद भी उनका जो मोहक गंवईपन था वह गया नहीं। वह हिंदी के सबसे पुरस्कृत कवि थे। साहित्य अकादमी सहित कई पुरस्कार उनको मिल चुके हैं। उनका न रहना भारतीय कविता के लिए एक क्षति है।
-अशोक वाजपेयी
केदारनाथ सिंह नहीं मैं नही रहा। मेरे लिए जो मेरे जीवन का सर्वोत्तम अंश था वह केदारनाथ सिंह के साथ चला गया। वह श्रेष्ठ कवि तो थे ही बड़े आदमी भी थे। आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास केदारनाथ सिंह के बिना पूरा नही होता। (फफक कर रोते हुए) वो मेरे शिक्षक मेरे साथी थे। उनसे मैंने काव्य और साहित्य की शिक्षा पाई थी। उनके साथ मेरा बहुत कुछ चला गया। उन्होंने मेरी बहुत सहायता की थी। - विश्वनाथ त्रिपाठी
वह जितने बड़े कवि थे उतने ही सरल थे। उनमें कभी अहंकार नही देखा। बहुत आत्मीय रूप से हाल चाल पूछते थे। मैं 30 साल से उनको जानती हूँ। उनकी कविताएं हर वर्ग में लोकप्रिय हैं। बड़ा कवि वही है जिसकी कविताएं लोगों की जुबान पर हों। - मैत्रेयी पुष्पा
मैं तीन दशकों से उनसे जुड़ा रहा। बलिया में मेरा घर इनके घर से नजदीक है। वह गाव के मेहनतकश मजदूरों से भोजपुरी में बातचीत करते थे और कहते थे कि इससे मेरी भाषा ठीक रहती है। वो कहते थे कि, भोजपुरी हमारा घर है और हिंदी हमारा देश है। न घर छोड़ सकता हूं और न देश। - अजित दुबे- (अध्यक्ष, अखिल भारतीय भोजपुरी महासंघ)
