नई दिल्ली [नेमिष हेमंत]। बंटवारा भले हुआ है, लेकिन एक तरह की बसावट लिए दिल्ली और लाहौर के मुगलकालीन शहर के दिल एक तरह से ही धड़कते हैं। वैसे ही संकरी गलियों में जिंदगी भागती, दौड़ती और सुस्ताती है। ऐसे में जब बात चांदनी चौक के पुनर्विकास की आई तो नजीर लाहौर को बनना ही था। लाहौर में विश्व बैंक की सहायता से 2012 में पुनर्विकास का काम शुरू हुआ, जिसका पहला चरण 2015 में पूरा भी कर लिया गया है।

इसमें तारों को भूमिगत करने के साथ पुराने लाहौर में वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाते हुए फुटपाथों को विकसित किया गया है। यहां तक की वहां की हवेलियों और मकानों को भी संरक्षित किया गया। वहीं, दिल्ली में पुरानी दिल्ली को विकसित करने के लिए 2008 में शाहजहांनाबाद पुनर्विकास निगम का गठन किया गया। उम्मीद यह की गई कि 2010 में जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल का खेल आयोजित होगा, तब यह विदेशी पर्यटकों के सामने अद्भभुत शहर के तौर पर सामने आएगा, लेकिन अब भी पुराने दिल्ली के पुनर्विकास का काम कछुआ गति से चल रहा है। एक दिसंबर से जब फिर से परियोजना ने गति पकड़ी है तो नजीर लाहौर है।

परियोजना से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक पुरानी दिल्ली की बसावट और समस्या लिए लाहौर का पुनर्विकास हो सकता है तो फिर चांदनी चौक का क्यों नहीं। लाहौर की तर्ज पर बना था प्लान पुरानी लाहौर व पुरानी दिल्ली की बसावट एक सी है। दोनों सिटी ऑफ वॉल के भीतर बसे हुए हैं।

पुरानी दिल्ली में जहां 14 गेट थे (अब छह गेट वजूद में हैं) वहीं, लाहौर में 12 गेट हैं, जिसमें से कुछ समान नाम के हैं जैसे दिल्ली गेट, कश्मीरी गेट व मोरी गेट।

खास बात कि चांदनी चौक के जब पुनर्विकास परियोजना बनी तो शाहजहांनाबाद पुनर्विकास निगम (एसआरडीसी) के नोडल अधिकारी नितिन पाणिग्रही ने लाहौर में पुनर्विकास परियोजना को ध्यान में रखकर 2015 में प्रोजेक्ट बनाया, जिसको योजना व वित्त विभाग से मंजूरी भी मिल गई।

इसमें लाहौर की तर्ज पर एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से मदद लेने का सुझाव था, लेकिन 2017 में एसआरडीसी बोर्ड बैठक में इस सुझाव को खारिज करते हुए केंद्र सरकार की विरासत शहर विकास और विस्तार योजना (हृदय) योजना अंतर्गत इसके विकास का निर्णय लिया। योजना के मंजूरी के लिए आवास व शहरी मामलों मंत्रालय में भेजा गया। वहां एक साल से मंजूरी के लिए फाइल अटकी हुई है।