नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। वायु प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली सरकार ने भले ही सोमवार से ऑड-इवेन लागू कर दिया हो, लेकिन पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली अग्रणी संस्था द एनर्जी रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) का आकलन है कि दिल्ली-एनसीआर को इससे कोई बड़ा फायदा नहीं मिलेगा। टेरी के अनुसार इसका असर एक फीसद से भी कम होने की उम्मीद है।

वहीं, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो ने दावा किया है कि ऑड-इवेन का असर 13 फीसद तक हो सकता है। लेकिन, टेरी ने इस संभावना पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा है कि आइआइटी कानपुर की रिपोर्ट जब यह बता रही है कि निजी गाड़ियों की हिस्सेदारी ही महज दो फीसद है तो ऑड-इवेन का असर 13 फीसद तक कैसे हो सकता है?

टेरी के अनुसार सुधार के लिए एयर क्वॉलिटी इंडेक्स (एक्यूआइ) को समझना जरूरी है। यह पीएम 10, पीएम 2.5, नॉक्स, एसओ-टू, सीओ और एनएच-थ्री के साथ लेड के आधार पर जारी किया गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक दिल्ली की हवा में इस समय सबसे अधिक पीएम 2.5 की मात्र है। इसलिए इसे कम करने की जरूरत है।

आइआइटी कानपुर और एआरएआइ-टेरी के अध्ययन में पीएम 2.5 के अधिक होने की वजह बताई गई है। बताया गया है कि सड़कों पर इस समय अलग-अलग ईंधन की अलग-अलग साल में बनी गाड़ियां चल रही हैं। ऑड-इवेन में निजी गाड़ियों को ही शामिल किया गया है।

आइआइटी कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में पेट्रोल और डीजल से चल रहीं निजी गाड़ियों से दो ही फीसद प्रदूषण होता है। हल्की व्यावसायिक गाड़ियों से 0.8 फीसद, दुपहिया गाड़ियों से 6.6 फीसद, ट्रक से 9.2 फीसद, बस (सीएनजी) से 1 फीसद और ऑटो व अन्य तिपहिया गाड़ियों से 0.4 फीसद प्रदूषण होता है। ऐसे में जिन छूटों के साथ दिल्ली में ऑड-इवेन को लागू किया गया है, उससे प्रदूषण के स्तर में अधिकतम दो फीसद तक कमी आने की ही संभावना है।

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