नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। विभागीय खींचतान कहें अथवा हीलाहवाली.. प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए मिली जिस जमीन का मालिकाना हक वन विभाग के पास होना चाहिए, वह अभी भी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के पास है। नतीजा, राजधानी के विभिन्न इलाकों की 136 हेक्टेयर से भी ज्यादा जमीन की सुरक्षा और रखरखाव भगवान भरोसे है। वहां पर किए गए वृ़क्षारोपण की देखभाल भी जैसे तैसे ही हो रही है।

विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के चलते वन विभाग को बहुत सी जगहों पर अपनी जमीन छोड़नी पड़ती है। इसके एवज में प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए डीडीए की ओर से वन विभाग को जमीन उपलब्ध कराई जाती है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 कहता है कि प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए मिली जमीन का मालिकाना हक वन विभाग अपने अधीन लेकर भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत उसे संरक्षित घोषित कर सकता है। उस जमीन की देखभाल और वहां पर किए गए वृक्षारोपण की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। लेकिन, दिल्ली में ऐसा नहीं है।

सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक वन विभाग के पास डीडीए से मिली ऐसी जमीन का आंकड़ा 136.55 हेक्टेयर है। हैरत की बात यह कि इस सारी जमीन का मालिकाना हक अभी भी डीडीए के पास है। वन विभाग का कहना है कि दिल्ली को विशेष दर्जे में रखते हुए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रलय ने प्रतिपूरक वृक्षारोपण की जमीन का मालिकाना हक डीडीए के ही पास रखने का निर्देश दे रखा है। दूसरी तरफ वन विभाग का यह भी कहना है कि ऐसी जमीन को भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत संरक्षित घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है।

Edited By: Mangal Yadav