नई दिल्ली [वीके शुक्ला]। दिल्ली की राजनीति में वह दौर कुछ अलग था जब 15 साल तक दिल्ली की सत्ता पर शीला दीक्षित ने राज किया। छोटे से बड़े अधिकारी तक को वह सम्मान देती थीं। यह उनकी तहजीब में था कि प्यार से सभी को बेटा कह कर बुलाती थीं। यही उनका हथियार भी था। अधिकारी फंसे कार्यों को भी आगे बढ़ाने का रास्ता निकाल लेते थे। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान जब योजनाएं पिछड़ रही थीं तब भी वह हिम्मत नहीं हारीं।

शीला के पहले मुख्य सचिव रहे उमेश सैगल ने बताया कि पहले दिल्ली में भाजपा की सरकार थी। सरकार बदली थी तो ऐसा माना जा रहा था कि नीतियां बदलेंगी। मगर वह पहले से चली आ रही नीतियों की समीक्षा करती थीं और अधिकारियों की राय लेती थीं। मुझे ध्यान है कि शीला जी से पहले की भाजपा सरकार ने सर्वोदय विद्यालय खोलने की योजना लागू की थी। वह चाहतीं तो उसे बंद कर सकती थीे। उनका मुख्य फोकस शिक्षा पर था, उनके दिमाग में दो बाते थीं एक तो स्कूल टेंट में न चलें और दूसरे बच्चे जमीन पर न बैठें। मैंने उन्हें कभी तेज आवाज में बोलते नहीं देखा। कभी कुछ कहना होता था तो सुबह घर पर ब्रेकफास्ट पर बुलाकर प्यार से कहती थीं।

मुख्य सचिव राकेश मेहता ने उनकी बातों को याद करते हुए कहा, वह अक्सर सरकार की बैठकों में भी अधिकारियों को बेटा कह कर संबोधित करती थीं। शीला सरकार में वित्त और ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव रहे शक्ति सिन्हा ने कहा, मैं करीब एक साल तक शीला जी के साथ रहा। उनकी खास बात मुङो पसंद आई कि बात को पूरी तरह सुनती थीं।

लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता से सेवानिवृत्त हुए दिनेश कुमार ने कहा कि मैं शीला जी के समय 12 साल तक दिल्ली में रहा। वह जब सत्ता में आईं तो मैं अधीक्षण अभियंता था। मैंने उनकी एक खास बात देखी कि वह निचले स्तर के अधिकारियों से भी सीधे तौर पर बात करना पसंद करती थीं। कभी आदेश देते नहीं देखा। राष्ट्रमंडल खेलों के बाद भ्रष्टाचार को लेकर आरोप लगे तो हम सभी को बुलाकर पूछा कि हमारे काम में तो कहीं कोई गड़बड़ी नही है। बाद में जब सीबीआइ आदि की जांच शुरू हुई तो भी उनका कहना था कि हमने कुछ गड़बड़ नहीं किया है जांच करने दो उन्हें।

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Posted By: JP Yadav