नई दिल्ली [अरविंद कुमार द्विवेदी]। प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए सेंट्रल रिज को विलायती कीकर से मुक्त करने की योजना बनाई गई है। सेंट्रल रिज के तहत आने वाले बुद्धा जयंती पार्क, तालकटोरा स्टेडियम व दिल्ली कैंट के बड़े क्षेत्र को चरणबद्ध तरीके से कीकर मुक्त किया जाना है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति कुलपति व डीडीए की बायोडायवर्सिटी पार्क परियोजना के प्रभारी प्रो. सीआर बाबू के नेतृत्व में दिल्ली के अन्य बायोडायवर्सिटी पार्कों में भी यह काम किया जा रहा है, लेकिन राजधानी की कालोनियों व गांवों के पार्कों और हरित क्षेत्रों में फैले कीकर पर किसी का ध्यान नहीं है। यहां से कीकर हटाने के लिए न तो कोई योजना चल रही है और न ही स्थानीय लोग इन्हें हटा सकते हैं।

कानूनी मजबूरियों और जटिल प्रक्रिया के कारण बायोडायवर्सिटी पार्कों से भी कीकर को पूरी तरह से खत्म होने में अभी कई साल लग सकते हैं। ग्रेटर कैलाश के जहांपनाह सिटी फारेस्ट, कालकाजी स्थित हंसराज सेठी उद्यान, ओखला स्थित डीडीए की भूमि, तुगलकाबाद फोर्ट का इलाका, एमबी रोड पर लालकुआं व प्रेमनगर आदि इलाके कीकर से भरे पड़े हैं। हालांकि, जहांपनाह सिटी फारेस्ट व हंसराज सेठी उद्यान में देशज पेड़-पौधे लगाकर चरणबद्ध तरीके से कीकर को हटाया जा रहा है, लेकिन कालोनियों व गांवों के आरडब्ल्यूए पदाधिकारी निगम व वन विभाग से कीकर हटाने के संबंध में शिकायत भी करते हैं तो उन्हें नियम-कानून का हवाला देकर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।

कानूनी संरक्षण बन रहा कीकर उन्मूलन में बाधा

बायोडायवर्सिटी पार्कों में कीकर उन्मूलन के लिए काम कर रहे पारिस्थितिकी विज्ञानियों का कहना है कि कीकर को काटने या पूरी तरह से हटाने में सबसे बड़ी बाधा ट्री एक्ट है। सभी पेड़ों की तरह कीकर को भी इस एक्ट में कानूनी संरक्षण प्राप्त है। कीकर को काटने या हटाने के लिए वन विभाग से अनुमति लेनी होती है।

बिना काटे कीकर को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल

वहीं, बिना काटे कीकर को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। दक्षिणी दिल्ली के उप वन संरक्षक अमित आनंद ने बताया कि पहले कीकर के पेड़ की टहनियों को काटकर कैनोपी बनाकर इसकी छाया खत्म की जाती है। फिर इसके आसपास देशज पेड़-पौधे लगाए जाते हैं। जब ये बड़े हो जाते हैं तो इनकी छाया में कीकर की ठूंठ को सूर्य की पर्याप्त रोशनी नहीं मिल पाती है, जिससे वह धीरे-धीरे सूख जाता है। इसके तहत सिर्फ उन्हीं टहनियों को काटा जाता है, जिनकी मोटाई दस सेंटीमीटर तक होती है। वहीं, इसके आसपास कीकर के नए पौधे नहीं उगने दिए जाते हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा वक्त लग जाता है। कीकर उन्मूलन प्रोजेक्ट के तहत ट्री अथारिटी के दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए यह प्रक्रिया अपनाई जाती है।

विलायती कीकर के यह हैं नुकसान

-देशज पेड़ों की जड़ें पानी को ऊपर खींचती हैं, जिससे भूजल स्तर ऊपर उठता है, जबकि कीकर की जड़ें बहुत गहरे तक जाकर पानी सोख लेती हैं। इससे कीकर के आसपास की जमीन का भूजल स्तर और गिरता जाता है। यह देशज पेड़ों की अपेक्षा अधिक पानी सोखता है।

- खुद जीवित रहने के लिए कीकर देशज पेड़-पौधों की तुलना में ज्यादा पोषक तत्व व पानी का दोहन करता है, इसलिए इसके आसपास अन्य पेड़-पौधों के लिए पोषक तत्व बचते ही नहीं हैं।

-इसमें जहरीले रासायनिक तत्व होने के कारण इसकी पत्तियां डिकंपोज नहीं होती हैं। इससे पेड़ के नीचे न तो कोई अन्य पौधा उगता है और न ही मिट्टी में नमी रह जाती है। इस कारण पेड़ के नीचे कीट-पतंगे भी नहीं पनपते हैं, इसलिए कीकर पर न तो कोई चिड़िया आती है और न ही कोई अन्य जीव-जंतु। इससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है।

-कीकर के दुष्प्रभाव से देशज घास-फूस, पौधे खत्म होते जा रहे हैं।

यह भी जानें....

-सड़कों के किनारे व डिवाइडरों पर उगे कीकर सड़कों तक फैल जाते हैं।

-ओखला, तुगलकाबाद, तेहखंड, कालकाजी, रंगपुरी, वसंत कुंज, किशनगढ़, रजोकरी, वसंत विहार, गुरु रविदास मार्ग आदि इलाकों में सड़कों के किनारे लगे कीकर की झाड़ियों के कारण फुटपाथ भी ढक गए हैं।

Edited By: Prateek Kumar