अंशु सिंह। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन डिजाइनिंग के अंतिम वर्ष के छात्र प्रदीप भट्ट ने सातवीं-आठवीं कक्षा में ही डिजाइनर बनने का सपना देखा था। लेकिन कैसे बनेंगे, हल्द्वानी के इस युवा को यह मालूम नहीं था। न परिवार में और न कहीं से कोई मार्गदर्शन करने वाला था। पिता तो उनके निर्णय के सख्त खिलाफ थे। महीने भर तक बात नहीं की। प्रदीप ने घर में भूख हड़ताल तक की, पर अपने सपने से समझौता नहीं किया। खुद से सारी जानकारियां इकट्ठा कीं और बिना किसी मेंटर की सहायता के अपनी मंजिल निफ्ट तक पहुंच गए। यही प्रदीप, हाल में सुर्खियों में आए जब कामेडियन वीर दास उनकी डिजाइन की हुई ड्रेस पहन एमी अवार्ड्स में शामिल हुए।

प्रदीप, बताते हैं ‘एक दिन अचानक वीर दास के रीट्वीट पर नजर गई, जिसमें वह एक फैशन डिजाइनर की तलाश कर रहे थे, जो नवोदित या स्टूडेंट कोई भी हो सकता था। मैंने ईमेल पर अपने कुछ डिजाइंस उनसे साझा किए। जवाब की उम्मीद नहीं थी। लेकिन हैरान रह गया जब उनकी टीम ने संपर्क किया और मुझे 20 दिन के अंदर ड्रेस तैयार करने को कहा। शुरू में थोड़ा डर लगा। एक मिश्रित-सा एहसास था। क्योंकि कालेज के असाइनमेंट करने और किसी अंतरराष्ट्रीय इवेंट के लिए ड्रेस डिजाइन करने में बहुत फर्क होता है। मैंने रिसर्च किया, वीर दास के व्यक्तित्व व स्टाइल की बारीकियों के साथ इवेंट के मद्देनजर ड्रेस तैयार किए, जिसे उन्होंने अवार्ड समारोह में पहना। दरअसल, मैं हमेशा से अंतरराष्ट्रीय डिजाइनर्स को फालो करता रहा हूं। एक छात्र के लिए इंटरनेशनल इवेंट के लिए ड्रेस डिजाइन करना किसी उपलब्धि से कम नहीं है। एक हद तक अपने सपने को पूरा कर पाया हूं। निफ्ट में पहचान मिलने के साथ मुझे अपने हुनर को तराशने का हौसला मिला है। विभिन्न प्रदेशों के स्टूडेंट्स के अलावा फैकल्टी से बहुत कुछ सीख पाया हूं।‘

कौशल से आगे बढ़ते युवा : दोस्तो, एपल के सह-संस्थापक स्टीव जाब्स कहा करते थे कि दूसरों की टिप्पणियों, उनकी अपेक्षाओं या विरोध से डरकर अपने मन की आवाज को कभी अनसुना नहीं करना चाहिए। कोई दूसरा आपके सपने को सही-सही समझ नहीं सकता। इसलिए स्वयं की क्षमता एवं हुनर को पहचान कर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। हाल ही में संपन्न ‘इंडिया स्किल्स 2021 क्षेत्रीय प्रतियोगिता’ में देश के आठ राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के साढ़े चार सौ से अधिक युवाओं ने हिस्सा लेकर यह साबित किया कि वे अपने कौशल पर कितना विश्वास रखते हैं। युवाओं ने लैंडस्केपिंग गार्डेनिंग, ब्रिक लेइंग, कारपेंट्री, पेंटिंग, ब्यूटी थेरेपी, मोबाइल रोबोटिक्स, फ्लोरिस्ट्री जैसी अनेक विधाओं में अपने हुनर दिखाए। केरल के बीटेक (कंप्यूटर साइंस) के दूसरे वर्ष के छात्र मोहम्मद सियाद आठवीं कक्षा से रोबोटिक्स में गहरी रुचि रखते थे। इंटरनेट की सहायता से उन्होंने इसके बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली थी। एक समय आया, जब सियाद ने छोटे-छोटे रोबोट्स विकसित करने शुरू कर दिए। वह बताते हैं, ‘2016 में मैंने पहली बार वायस कंट्रोल्ड रोबोट तैयार किया था। उसके बाद रोबोटिक व्हीलचेयर बनाई। यह एक स्मार्ट रोबोट है, जिसका दिव्यांगजन आसानी से उपयोग कर सकते हैं। इसे एप की मदद से संचालित किया जा सकता है। अगर मेंटरशिप की बात करूं, तो हमारे देश में रोबोटिक्स को लेकर जितनी दिलचस्पी देखी जा रही है, उसकी तुलना में तकनीकी संस्थानों में विशेषज्ञों की कमी है। मैं खुद अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स एवं रिसर्च पेपर्स की मदद से रोबोट्स डेवलप करता हूं।‘ सियाद का कहना है कि 'इंडिया स्किल्स 2021' क्षेत्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से उन्हें अच्छा एक्सपोजर मिला है। उनकी मानें, तो जितनी जल्दी बच्चों को नई तकनीक, रोबोटिक्स आदि से अवगत कराया जाएगा, उससे आगे चलकर उन्हें ही फायदा होगा।

बनाया आइओटी आधारित बैडमिंटन रैकेट : मेरठ के 12वीं कक्षा के विज्ञान के छात्र (सिटी वोकेशनल पब्लिक स्कूल) पार्थ बत्रा ने स्पोर्ट्स एनालिटिक्स के क्षेत्र में एक बैडमिंटन रैकेट में तकनीक के अभिनव प्रयोग का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। पार्थ ने बैडमिंटन का प्रशिक्षण हासिल करने के दौरान यह अनुभव किया कि कोच द्वारा प्रत्येक खिलाड़ी के फीडबैक को तकनीक के प्रयोग से बेहतर बनाया जा सकता है। इसके पीछे अवधारणा यह थी कि कोच हर समय हर किसी खिलाड़ी का खेल नहीं देख सकते हैं और यदि ऐसा संभव भी हो पाये तो बाद में इन सभी को वीडियो के माध्यम से देखा तो जा सकता है पर किसी भी प्रकार का आंकड़ा हासिल कर पाना संभव नहीं हो पाता है। पर यदि किसी तरह से खिलाड़ियों के खेल जैसे कि उनके शाट्स के मूवमेंट के आंकड़ों को बाद में देखा जा सके तो यह संभव है कि फीडबैक को और अधिक उन्नत करके खिलाड़ी के खेल में सुधार लाया जा सके। अपनी इस उत्सुकता के चलते उन्हें एक साधारण से बैडमिंटन रैकेट को इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आइओटी) के इस्तेमाल से एक नये रूप में प्रस्तुत करने में सफलता मिली है। पार्थ द्वारा विकसित यह रैकेट अपने आप में पहला ऐसा रैकेट है जो खिलाड़ियों के खेल को बेहतर बनाने में सहायक होगा। पार्थ का कहना है कि, ‘इसके माध्यम से बैडमिंटन खिलाड़ी द्वारा मारे गए शाट्स की मूवमेंट के आंकड़ों को कंप्यूटर स्क्रीन पर देखकर डेटा साइंस की मदद से उसका विश्लेषण किया जा सकता है। इससे यह तय किया जा सकता है कि किस प्रकार के मूवमेंट से खिलाड़ी को अपना खेल सुधारने में मदद मिलेगी। इस बैडमिंटन रैकेट में आंकड़ों को कंप्यूटर में भेजने के लिए नैनो प्रोग्रामिंग बोर्ड के साथ एक्सीलेरोमीटर तथा जाइरोस्कोप सेंसर्स का उपयोग किया गया है।‘

चित्रकारी से बनायी नई पहचान : भोपाल स्थित परवरिश (म्यूजियम) स्कूल के बच्चे पढ़ाई के साथ कैंडिल मेकिंग, लोक चित्रकारी में बखूबी दिलचस्पी लेते हैं। प्रशिक्षकों की देखरेख में वे खुद को कुशल बनाने का प्रयास भी करते हैं, ताकि भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें। स्कूल की ही एक छात्रा आरती चित्रकारी के साथ बेकार चीजों से सुंदर वस्तुएं बनाया करती थीं। लेकिन उन्हें खुद ही अपने हुनर का एहसास नहीं था। आरती कहती हैं, ‘मैं पहले सिर्फ कागजों पर पेंटिंग किया करती थी। जब स्कूल में आयी, तो टीचर्स ने कुछ और करने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे मैं कलर पेंसिल से आगे बढ़कर एक्रेलिक पेंटिंग करने लगी। कैनवस पर चित्रकारी शुरू की। मेरी पेंटिंग्स की राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शनी भी लग चुकी है। पेंटिंग के अलावा नारियल से फ्लावर पाट, दीये के कैंडिल बनाती हूं। इन सबकी बिक्री से कुछ कमाई भी हो जाती है, जिससे परिवार की मदद कर पाती हूं। इन हुनर की वजह से आज एक आर्टिस्ट के रूप में नई पहचान बनी है।‘

नये क्षेत्रों में काबिलियत दिखातीं बेटियां : लड़कियां आज उन तमाम क्षेत्रों में अपनी काबिलियत के बल पर आगे बढ़ रही हैं, जो कभी उनके लिए वर्जित थे। इसके लिए वह बाकायदा प्रशिक्षण भी ले रही हैं। जैसे मणिपुर के कामजोंग जिले की आरके पेनमिला ने हैदराबाद के हैमस्टेक इंस्टीट्यूट आफ फैशन एवं इंटीरियर डिजाइनिंग से कोर्स किया। लेकिन वह फर्नीचर बनाना चाहती थीं। इसलिए शिलांग के डान बास्को टेक्निकल स्कूल से कारपेंट्री का एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स किया। उनका कहना है कि किसी भी फील्ड को चुनने के लिए लिंग भेद नहीं होना चाहिए। जिसका जिसमें पैशन है, उसे वही करना चाहिए। वाराणसी की वंदना सिंह ने लखनऊ से आर्किटेक्चर में डिप्लोमा किया है। हाल ही में संपन्न इंडिया स्किल्स क्षेत्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने ईंटों की चिनाई (ब्रिक लेइंग) ट्रेड में अपनी कुशलता का परिचय दिया। वंदना कहती हैं, ‘हमें खुद को पता नहीं होता कि हम क्या कर सकते हैं। ऐसे में जिस भी क्षेत्र में काम करें, उससे जुड़ी हर स्किल की जानकारी होनी चाहिए। सामने आने वाले हर अवसर का फायदा उठाना चाहिए। सिविल इंजीनियरिंग या आर्किटेक्चर में लड़कियां अमूमन फील्ड वर्क से संकोच करती हैं। लेकिन मैं इस संकोच को तोड़ना चाहती थी। इसलिए मैंने सीआइटीएस करने का फैसला लिया। यह एक वर्ष का क्राफ्ट्स इंस्ट्रक्टर ट्रेनिंग कोर्स है, जिसे करने के बाद किसी आइटीआइ कालेज में बतौर इंस्ट्रक्टर काम शुरू कर सकती हूं।‘

कौशल से बढ़ता है आत्मविश्वास : कांगड़ा निफ्ट के फैशन डिजाइनिंग के फाइनल ईयर स्टूडेंट प्रदीप भट्ट ने बताया कि मेरे परिवार या दोस्तों में कोई भी फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र से परिचित नहीं था। उत्तराखंड में अधिकतर युवा सेना या मेडिकल फील्ड में करियर बनाने को प्राथमिकता देते आए हैं। ऐसे में मेरे द्वारा इस फील्ड को चुने जाने पर सबने बहुत सवाल उठाए। लेकिन मुझे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर विश्वास था कि मुझे इसी में आगे बढ़ना है। अभी बहुत सीखना है। गलतियां करनी है। अपने में सुधार लाना है। मेहनत में विश्वास करता हूं। फास्ट फैशन में भरोसा नहीं है। आर्टिस्टिक एवं एब्स्ट्रैक्ट चीजें आकर्षित करती हैं। कुछ अर्थपूर्ण करना चाहता हूं। मैं मानता हूं कि जब हम खुद को किसी विधा में कुशल यानी स्किल्ड बनाते हैं, तो उससे आत्मविश्वास आता है। हम उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ पाते हैं। हर किसी की अपनी स्किल होती है। कोई अच्छी स्टिचिंग कर सकता है, कोई पैटर्न डिजाइनिंग में महारत रखता है। मेरे पास इनोवेटिव आइडियाज होते हैं, जिन्हें लागू करनी की क्षमता भी रखता हूं। युवाओं से कहना चाहूंगा कि किसी एक विधा में खुद को अवश्य हुनरमंद बनाएं।

मातृभाषा के माध्यम से स्टोरीटेलिंग : बाल स्टोरीटेलर वैशाली ने बताया कि मैं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती हूं, लेकिन अपनी मातृभाषा मैथिली से गहरा लगाव है। मैथिली गीत-संगीत में गहरी रुचि है। कोरोना काल में कुछ नया करने के लिहाज से मैंने स्टोरीटेलिंग करनी शुरू की। पहले अंग्रेजी में ही कहानियां सुनाया करती थी, क्योंकि तब मैथिली ज्यादा नहीं आती थी। इसलिए शुरू में थोड़ी दिक्कत हुई। लेकिन ‘प्रोजेक्ट आइबीएके’ से जुड़ने के बाद मैंने मैथिली में ही मिथिलांचल की सुप्रसिद्ध कहानियां, वहां मनाए जाने वाले पर्व-त्योहार से जुड़े किस्से सुनाने शुरू किए। यह बिल्कुल नया अनुभव था। अभियान में शामिल होने से कई प्रकार के फायदे हुए। देश के अन्य राज्यों में बोली जाने वाली भाषाओं की कहानियां बच्चों से सुनने को मिलीं। किसी मंच पर प्रस्तुति को लेकर मन के अंदर जो डर रहता था, वह दूर हो गया। आत्मविश्वास आया। मैं अब उन दोस्तों को भी अपनी मातृभाषा जानने के लिए प्रेरित कर पा रही हूं,जो इससे भागते थे। उसे बोलने से शर्माते या कतराते थे।

Edited By: Sanjay Pokhriyal