नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। Indian monsoon News: साल दर साल मानसून का बदलता पैटर्न अब किसानों को परेशान नहीं कर पाएगा। वजह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआइ) के अधीन सेंट्रल रिसर्च इंस्टीटयूट फार ड्राइलैंड एग्रीकल्चर (सीआरआइडीए) क्राप वेदर कैलेंडर में बदलाव कर रहा है। नए डायनेमिक कैलेंडर में औसत के बजाय रियल टाइम मौसम को आधार बनाया जा रहा है।

किसानों को बुआई में आती है परेशानी

इसी के अनुसार देश भर के किसानों को भविष्य में एडवाइजरी जारी की जाएगी।जलवायु परिवर्तन की वजह से मानसून में आ रहे बदलावों के बाद अब क्राप वेदर कैलेंडर में बदलाव करना भी जरूरी हो गया है। मार्च- अप्रैल में बरसात 80 प्रतिशत तक कम हो रही है। इससे इन दोनों महीनों में किसान अपनी जमीन को बुआई के लिए तैयार नहीं कर पाते।

मौसम का आंकलन अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी

वहीं जून अगस्त में भी शुष्क दिनों की संख्या बढ़ी है। इसकी वजह से अब जून में भी किसानों ने बिजाई करना काफी कम कर दिया है। जानकारी के मुताबिक मानसून का आंकलन मौसम विभाग दो बार करता है। एक बार मानसून आने से पहले जबकि दूसरा मानसून का आधा सीजन होने पर किया जाता है। दोनों आंकलन अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।

किसानों के अलावा व्यापार क्षेत्र के लोगों की भी नजर इस पूर्वानुमान पर रहती है। लेकिन अब मानसून का पैटर्न बदल रहा है। मिनटों और घंटों के अंतराल पर स्थितियां बदल रही हैं। जून और अगस्त में शुष्क दिनों की संख्या बढ़ रही है। कभी बरसात अधिक हो रही है तो कभी मानसून में भी नहीं हो रही है। प्री मानसून सीजन में भी वर्षा काफी कम रह गई है।

मौसम में समय से बारिश न होने से किसान परेशान

प्री मानसून में ही किसान अपनी जमीन को बिजाई के लिए तैयार करते हैं, लेकिन बरसात न होने के कारएा नमी के अभाव में वह यह काम नहीं कर पाते। मानसून का पूर्वानुमान मानते हुए कुछ किसान बिजाई कर भी देते हैं तो बिजाई के बाद अगले कुछ दिन या तो वर्षा नहीं होती या फिर तेज हो जाती है। दोनों में ही किसान को नुकसान होता है। कई जगहों पर किसान अब जून में बिजाई नहीं करते। क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें पिछले कई सालों से नुकसान होता आया है।

 क्राप वेदर कलेंडर

भारत का क्राप वेदर कलेंडर 1996 में बना था। इसके बाद से बरसात के पैटर्न में कई बदलाव हो चुके हैं। इसी आधार पर मौसम के पैटर्न की समीक्षा और उसके अनुसार इन चीजों में बदलाव भी जरूरी है। साथ ही किसानों को भी अलर्ट की जानकारी देना जरूरी है। किसानों के लिए यह जरूरी है कि उन्हें यह सही सही पता चले कि आने वाले पांच से छह दिनों में मौसम कैसा रहेगा। इसका सटीक आकलन जरूरी है।

पानी को इकट्ठा करने की जरूरत

पानी जब तेजी से बरसता है तो वह बहकर निकल जाता है, इसलिए इस पानी को स्टोर करने की जरूरत है। इसके लिए जहां भी जगह है पानी को एकत्रित किया जाए। जब मानसून के दौरान भी शुष्क दिन आते हैं तो इस पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। चेक डेम को बढ़ावा दिया जाए। ताकि तीन चार दिन की बारिश में भी जो पानी बरस रहा है वह अधिक से अधिक स्टोर किया जा सके।

रियल टाइम डाटा बेस बनाने का होगा प्रयास

डा प्रोमिला कृष्णन, कृषि मौसम विज्ञानी, आइसीएआर) का कहना है कि हमारी कोशिश हमेशा ही किसानों को अधिकाधिक उपयोगी सूचना देने की रहती है। इसी के तहत पहले क्राप वेदर कैलेंडर में मानसून की वर्षा के औसत मानकों के अनुरूप एडवाइजरी जाती की जाती है मगर अब हम इसे मौसम विभाग के सहयोग से रियल टाइम डाटा बेस बनाने के लिए प्रयासरत हैं। इससे किसानों को मौजूदा स्थिति के अनुरूप ज्यादा प्रामाणिक और प्रासंगिक बनाने के लिए काम कर रहे हैं।

Edited By: Jp Yadav