नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। उच्च न्यायालय के समक्ष मामला लंबित होने के बावजूद भी निचली अदालत द्वारा जमानत याचिका पर विचार करने के अभ्यास पर चिंता व्यक्त करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे परेशान करने वाली प्रवृत्ति कहा है। न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता की पीठ ने कहा कि कई बार आदेश परिस्थितियों में किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव के बिना पारित किए जाते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति न्यायिक अनुशासन की पूर्ण अवहेलना हो सकता है।

पीठ ने उक्त टिप्पणी के साथ निचली अदालतों को निर्देश दिया कि जमानत आवेदन पर विचार करने से पहले अदालतें यह सुनिश्चित करें कि उच्च न्यायालय के समक्ष आरोपित के खिलाफ कोई आवेदन लंबित न हो। साथ ही यह पता लगाएं कि पूर्व जमानत आवेदन को खारिज किया गया है या नहीं। पीठ ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति दिल्ली की अधीनस्थ अदालतों में सभी न्यायिक अधिकारियों को भेजी जाए।

पीठ ने उक्त टिप्पणी याचिकाकर्ता शिव लिंगम की याचिका पर की। शिव ने याचिका दायर कर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को रद करने की मांग की थी। इसके तहत अप्रैल-2022 में एसीएमएम द्वारा उन्हें दी गई जमानत को भारतीय दंड संहिता की धारा-439(2)के तहत रद कर दिया गया था।

वहीं, अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में उसे घर पर जून-2020 में कब्जा किया था और इसी आरोप में उसे सितंबर-2021 में गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन पक्ष ने पीठ को यह भी बताया कि सत्र न्यायालय के समक्ष जमानत आवेदन के लंबित होने के बावजूद भी याचिकाकर्ता को एसीएमएम द्वारा जमानत दी गई थी।

Edited By: Vinay Kumar Tiwari