नई दिल्ली [ संजीव गुप्ता ] ।  रेलवे और दिल्ली मेट्रो की विज्ञापन आय में से स्थानीय निकायों को क्या कुछ मिलेगा, यह अब पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) तय करेगा। इसके लिए फिलहाल ईपीसीए कानूनी सलाह ले रहा है, जल्द ही इन तमाम एजेंसियों के आला अधिकारियों की बैठक करेगा। विवाद कानूनी रूप से पेचीदा होने पर अनसुलझा भी रह सकता है।

यह है विवाद

आउटडोर एडवरटाइजिंग पॉलिसी 2008 के मुताबिक नगर निगम और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) का कहना है कि विज्ञापनों से होने वाली आय उनकी कमाई के गिने चुने साधनों में से है। इस आय के जरिए ही जन कल्याण की विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है।

इसीलिए इनका कहना है कि रेलवे और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को भी अन्य विभागों की तरह किसी भी सार्वजनिक स्थान पर विज्ञापन लगाने से पहले स्थानीय निकाय आयुक्त से अनुमति भी लेनी होगी और उसकी आय में से विज्ञापन कर के रूप में 25 फीसद हिस्सा भी देना होगा, जबकि रेलवे और डीएमआरसी का कहना है कि वे स्थानीय निकायों से अनुमति लेने और उन्हें कर देने के लिए बाध्य ही नहीं है।

यह हैं तर्क

रेलवे का कहना है कि भारतीय रेल अधिनियम 1989 के सेक्शन 184 एवं 185 के तहत उसे स्थानीय निकायों को किसी भी प्रकार के कर के भुगतान से छूट प्राप्त है। वहीं डीएमआरसी कहती है कि दिल्ली मेट्रो रेल अधिनियम 2002 के सेक्शन 29 के तहत उसे भी अपने मेट्रो परिसर में कहीं भी विज्ञापन लगाने का अधिकार है। जबकि नगर निगम और नई दिल्ली नगर पालिका परिषद रेलवे और डीएमआरसी को केवल उन्हीं विज्ञापनों के लिए कर से छूट देने को तैयार है जो उनके अपने विज्ञापन हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ईपीसीए को सौंपी जिम्मेदारी

कई सालों से चल रहा यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। चूंकि ईपीसीए पर्यावरण संबंंधी मामलों के साथ-साथ आउटडोर एडवरटाइजिंग पॉलिसी में भी जन सुरक्षा के पहलु से जुड़ा रहा है, लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को निपटाने की जिम्मेदारी ईपीसीए को सौंप दी है।

ईपीसीए अध्यक्ष डा. भूरेलाल का कहना है कि हम इस विवाद के तमाम पहलुओं पर गौर कर रहे हैं। इसके कानूनी पक्षों पर भी विचार किया जा रहा है। अगर यह विवाद किसी कानूनी अड़चन से इतर हुआ तो जल्द ही इसका समाधान कर दिया जाएगा। हमारी कोशिश रहेगी कि इस विवाद मेें विकास कार्य प्रभावित न हो। लेकिन अगर कानूनी पेच आए तो फिर हमें इसको वापस सुप्रीम कोर्ट में ही भेजना पड़ेगा। हम कानूनी निर्णय नहीं ले सकते।


 

Posted By: Ramesh Mishra

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