नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। दिल्ली दंगे की साजिश रचने के आरोपित जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को कड़कड़डूमा कोर्ट ने बृहस्पतिवार को जमानत देने से इन्कार कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के कोर्ट ने आदेश में कहा कि आरोपपत्र में दिए तथ्यों व साक्ष्यों को देखते हुए आरोपित पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं। ऐसे में गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी व दंड प्रक्रिया संहिता धारा 437 में दिए गए प्रतिबंधों के तहत उमर खालिद की जमानत अर्जी खारिज की जा रही है। कोर्ट ने इस अर्जी पर तीन मार्च से निर्णय सुरक्षित रखा हुआ था। तीन बार कोर्ट ने निर्णय को टाला था।

कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि साजिश में किसी एक कृत्य को अलग से नहीं देखा जा सकता। घटनाओं की श्रृंखला को एक साथ देखना जरूरी है। जो तथ्य रखे गए उनसे पता चलता है कि उमर खालिद विशेष उद्देश्य के लिए बनाए गए वाट्सएप ग्रुप एमएसजे (मुस्लिम स्टूडेंट आफ जेएनयू) और डीपीएसजी (दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप) का हिस्सा था और उसमें उसकी उपस्थिति नागरिकता संशोधन कानून पारित होने से लेकर फरवरी 2020 में हुए दंगे तक बनी हुई थी। वह कई आरोपितों के संपर्क में भी था।

कोर्ट ने बचाव पक्ष के वकील की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उमर दंगे के वक्त दिल्ली में नहीं था। कोर्ट ने कहा कि गोपनीय गवाह नियोन के अनुसार अमानउल्लाह नामक व्यक्ति ने उमर को दंगे से 23 फरवरी 2020 को बाहर जाने के लिए कहा था। दूसरा गवाह बयान में उजागर कर रहा है कि उमर ने उससे 23 फरवरी 2020 की पटना के लिए फ्लाइट की टिकट बुक करने को कहा था। जब उसने फ्लाइट का टिकट महंगा होने और कुछ दिन बाद टिकट बुक करने की बात कही तो उमर ने उसे मना कर दिया। उसके बाद उमर ने उसी तारीख की सुबह साढ़े नौ बजे टिकट बुक कराई थी।

कोर्ट ने बचाव पक्ष के वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि उमर खालिद शोधकर्ता है और उसकी मनोस्थिति का आकलन उसके झारखंड के आदिवासियों के कल्याण पहलू पर आधारित पीएचडी के शोधपत्र और अन्य लेखों से की जा सकती है । कोर्ट ने कहा कि जमानत अर्जी पर फैसला करने के लिए ये पहलू प्रासंगिक नहीं है। अगर मनोस्थिति का आकलन इस तरीके से किया जाए तो इस मामले में आरोपित शरजील इमाम ने दंगे पर शोधपत्र लिखा है, लेकिन कोई शोधपत्र या शोध कार्य अकेले किसी भी आरोपित की मनोस्थिति का आकलन करने का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने आदेश में कहा कि जमानत पर फैसला आरोपपत्र में पेश किए गए तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

Edited By: Prateek Kumar