नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। लुक आउट सर्कुलर (एलओसी) को चुनौती देने वाली एक याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी नागरिक को तब तक हिरासत में नहीं लिया जा सकता है या गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है या फिर देश छोड़ने से रोका नहीं जा सकता जब तक कि उसके किसी जांच या मुकदमे का सामना करने का संदेह न हो।

न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता की पीठ ने कहा कि एक जांच एजेंसी केवल ऐसे नागरिक के आगमन या प्रस्थान की सूचना मांग सकती है।पीठ ने कहा कि जब इस तरह की एलओसी जारी की जाती है तो प्रस्थान या आगमन के बिंदु पर अधिकारी संबंधित एजेंसी को ऐसी सूचना देने के बहाने भी नागरिक को नहीं रोक सकते।

पीठ ने भारतीय नागरिकों और विदेशियों के संबंध में लुक आउट सर्कुलर (एलओसी) जारी करने के लिए 27 अक्टूबर 2010 को एफआरआरओ द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन के पैरा-आठ के खंड (एच) को नोट करते हुए स्पष्ट किया कि जो प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता वह परोक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता।

पीठ ने उक्त टिप्पणी भोजपुरी चैनल महुआ के प्रमोटर के बेटे व याचिकाकर्ता ध्रुव तिवारी की याचिका पर दिया। ध्रुव के पिता और दादा भोजपुरी चैनल महुआ के प्रमोटर थे। सीबीआइ ने वर्ष 2005 से 2011 के मामले में इनके खिलाफ वर्ष 2012-2013 में भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित बनाया गया था, लेकिन उन्हें आरोपित नहीं बनाया गया था। उस समय ध्रुव नाबालिग थे और उनकी उम्र आठ से 14 साल के बीच थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा मनी लांड्रिंग मामले में ध्रुव के खिलाफ एलओसी जारी की थी।

एलओसी को चुनौती देते हुए ध्रुव ने कहा कि 24 फरवरी 2021 में उन्हें जांच में शामिल होने को कहा गया था। एलओसी के कारण भारत आने पर ध्रुव को वर्ष 2021 में हवाई अड्डे पर तीन घंटे के लिए हिरासत में लिया गया था। इस पर पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को वर्तमान मामले में हिरासत में लेना स्पष्ट रूप से अनुचित था क्योंकि वह ईडी द्वारा शुरू किए गए मामले में आरोपित नहीं था। इतना ही नहीं लेन-देन के समय याचिकाकर्ता निश्चित रूप से नाबालिग था।

Edited By: Vinay Kumar Tiwari