यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 16, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Delhi Air Pollution: योजनाओं की मैराथन, फिर भी प्रदूषण से हांफ रहे शहर
आप सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला वर्ष पर्यावरण के लिहाज से खासा उल्लेखनीय कहा जा सकता है। वृक्ष प्रत्यारोपण ...और पढ़ें

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। आप सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला वर्ष पर्यावरण के लिहाज से खासा उल्लेखनीय कहा जा सकता है। वृक्ष प्रत्यारोपण नीति अधिसूचित हुई तो युद्ध-प्रदूषण के विरुद्ध नाम से एक अभियान भी चला। हालांकि वर्ष भर चले जिस अध्ययन की रिपोर्ट आनी थी वह नहीं आ पाई। इसी रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की नीतियां बननी थीं।
कोरोना काल में अनलाक (पाबंदियों में छूट देने का दौर) में सरकार ने सर्दियों में भी अनुकूल हवा बनाए रखने के लिए युद्ध-प्रदूषण के विरुद्ध चलाने की घोषणा की। इसके तहत एंटी डस्ट कैंपेन चलाया गया। निर्माण स्थलों के लिए एंटी स्माग गन अनिवार्य कर दी गई। एक ग्रीन एप लांच किया गया, जिस पर 24 घंटे प्रदूषण से जुड़ी कोई भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। फिर रेड लाइट आन, गाड़ी आफ अभियान चलाया गया। वर्ष के अंत में वृक्ष प्रत्यारोपण नीति भी अधिसूचित कर दी गई। अब एक पेड़ काटने पर 100 लगाने होंगे।
इतना सब होने पर भी दिल्ली को सर्दियों के प्रदूषण से नहीं बचाया जा सका। ठीकरा इस बार भी पराली के धुएं के सिर फूटा। पहला वर्ष पूरा होते-होते सामने आया कि एक साल पहले अमेरिका की यूनिवर्सिटी के साथ दिल्ली में वर्ष भर के वायु प्रदूषण पर अध्ययन कराने को जो समझौता हुआ था उसकी रिपोर्ट ही नहीं आई है। इसमें देखा जाना था कि किस मौसम में प्रदूषण क्यों बढ़ता है? रिपोर्ट बन भी गई, लेकिन शायद ठीक नहीं थी।
आखिर में वह समझौता भी रद कर दिया गया। अब आइआइटी कानपुर, दिल्ली और टेरी के साथ मिलकर किसी स्थान पर वास्तविक समय में प्रदूषण का मूल स्नोत पता लगाने के लिए रियल टाइम सोर्स अपोर्शनमेंट आफ एयर पाल्युशन तकनीक का सहारा लेने की घोषणा की गई है।
एक्सपर्ट की राय
प्रदूषण नियंत्रण में जन जागरूकता अभियान सर्वाधिक कारगर साबित हो सकते हैं। अगर ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) को पूरी सख्ती से लागू किया जाए तो भी निश्चित तौर पर सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर सख्त एक्शन हो। कारण, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग या सीपीसीबी प्लान तो बना सकते हैं, दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं, लेकिन उन पर अमल कराना राज्य सरकारों का ही काम है। दिल्ली सरकार के इस दिशा में उठाए गए कदम स्वागत योग्य हैं। ऐसे ही धीरे-धीरे हालात में सुधार आता जाएगा। (सुनीता नारायण, महानिदेशक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई), दिल्ली)
बायोडिकंपोजर दवा की पहल
पर्यावरण की बेहतरी के लिए 31 लाख पौधे रोपने की मुहिम चलाई गई। पराली की समस्या से निपटने के लिए पूसा इंस्टीट्यूट की मदद से दिल्ली के 800 हेक्टेयर में फैले खेतों में बायोडिकंपोजर दवा का छिड़काव किया गया।
निजी वाहनों पर निर्भरता अब भी समस्या
दिल्ली में प्रदूषण के लिए पराली का धुआं और बायोमास जलना ही नहीं, वाहनों का धुआं भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। साल दर साल 5.81 फीसद की दर से राजधानी में निजी वाहनों की संख्या बढ़ रही है। यह संख्या एक करोड़ 10 लाख के आंकड़े को छू रही है। दिल्ली में सबसे अधिक करीब 71 लाख दोपहिया वाहन और उसके बाद करीब 33 लाख कारें पंजीकृत हैं।
इसमें भी डीजल के वाहनों की तादाद बहुत ज्यादा है, जो प्रदूषण में इजाफे के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। शोध रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के प्रदूषण में पीएम 10 के स्तर पर वाहनों से 14 फीसद और पीएम 2.5 के स्तर पर 25 से 36 फीसद योगदान है।
