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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 01, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

दिल्ली का वायु प्रदूषण अब बन गया नासूर, लोग खतरनाक हवा में सांस लेने को मजबूर; पढ़ें क्या कहते हैं एक्सपर्ट

Published: Wed, 01 May 2024 08:38 PM (IST)

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी स्टेट आफ इंडियाज रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में सर्वाधिक 48 मानिटरिंग स्टेशन ...और पढ़ें

दिल्ली का वायु प्रदूषण अब बन गया नासूर।
दिल्ली का वायु प्रदूषण अब बन गया नासूर।

HighLights

  1. विभिन्न विभागों और स्थानीय निकायों के बीच नहीं रहता कोई सामंजस्य
  2. तमाम कार्य योजनाओं का नीचे तक पालन नहीं हो पाना भी बड़ी समस्या

संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। राजनीतिक स्तर पर आरोप प्रत्यारोप भले जो भी चलते रहें, लेकिन सच यह है कि दिल्ली का वायु प्रदूषण अब नासूर बन गया है। प्रदूषण के कारक भी बाहरी कम और भीतरी ज्यादा हैं। मसलन, दिल्ली के प्रदूषण में सर्वाधिक हिस्सेदारी धूल और धुएं की ही है।

पीएम 2.5 एवं पीएम 10 भी यहां तय सीमा से ज्यादा रहता है। हैरानी की बात यह कि सरकारी स्तर पर प्रदूषण से निपटने के लिए याेजनाएं तो तमाम बन रही हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन को लेकर गंभीरता कम ही नजर आती है।

विभागीय तालमेल का न होना सबसे बड़ी चुनौती

तमाम नियम कायदों के बावजूद यदि दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या खत्म नहीं हो पा रही है तो इसका सबसे बडा कारण विभागों एवं स्थानीय निकायों के बीच तालमेल न होना है। जमीनी स्तर पर कार्य योजनाओं का पालन नहीं हो पाना दूसरी सबसे बड़ी समस्या है।

प्रदूषण की मुख्य वजह

सार्वजनिक परिवहन अपर्याप्त है। बसें होनी चाहिए 15 हजार से भी अधिक लेकिन हैं सिर्फ 7,582 बसें। विकल्प के अभाव में ही दिल्ली में निजी वाहनों की संख्या एक करोड़ 10 लाख के आसपास पहुंच चुकी है। सरकार अथवा राज्य प्रदूषण नियंत्रण समिति के स्तर पर जो कार्य योजना बनाई जाती है, वह जमीनी स्तर पर गंभीरता से नहीं ही ली जाती। इसीलिए अभी भी जगह-जगह कूडे़ के ढेर में आग लगाई जा रही है तो कार्य निर्माण और सड़कों की साफ-सफाई में भी धूल उड़ती रहती है।

एयर क्वालिटी मानिटरिंग स्टेशनों का हाल

सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी स्टेट आफ इंडियाज रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में सर्वाधिक 48 मानिटरिंग स्टेशन हैं। इनमें 38 रियल टाइम हैं जबकि 10 मैन्यूल। लेकिन इतनी सघन निगरानी के बावजूद प्रदूषण थम नहीं रहा है।

यहां भी फंसा है पेच

  • वाहनों के प्रदूषण पर रोकथाम की कोई ठाेस व्यवस्था नहीं है। प्रदूषण जांच केंद्र प्रमाण पत्र तो जारी कर देते हैं, जांच ठीक से करते नहीं। यातायात और परिवहन विभाग कर्मी भी इनका चालान नहीं काटते।
  • कचरा निस्तारण की उचित व्यवस्था नहीं है। लैंडफिल साइटस का कूड़ा भी आबोहवा को दूषित करता है।
  • ग्रेडिंग रिस्पांस सिस्टम भी बन जरूर गया है लेकिन उस पर ईमानदारी और सख्ती से पालन करा पाने की व्यवस्था नहीं है।

दिल्ली के प्रदूषण पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • 12 जनवरी 2017 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) लागू हुआ।
  • जून 2018 को कंप्रेहनशिव क्लीन एयर एक्शन प्लान लागू किया गया।
  • 2017-18 की तुलना में बस यात्रियों में 48.5 प्रतिशत की गिरावट आई है।
  • एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में हर साल प्रति एक लाख लोगों पर तकरीबन 65 लोग प्रदूषण की चपेट में जान गंवा रहे हैं।

सरकारी स्तर पर लागू प्लानों की खामियां

  1. प्लान के क्रियान्वयन को लेेकर जवाबदेही तय नहीं।
  2. विभिन्न कार्यक्रमों के लिए फंड का स्पष्ट प्रविधान नहीं।
  3. लोकल स्तर पर उपयोगी एक्शन प्लान का अभाव।
  4. हवा को स्वच्छ कैसे बनाया जाए, इस पर ठोस प्लान नहीं।
  5. पर्यावरण को प्रभावित किए बगैर विकास कार्य कैसे हों, इस बाबत दिशा निर्देश नहीं।

देखिए, सर्दियां छोड़कर बाकी के दिनों में दिल्ली का प्रदूषण कम हो रहा है। ''संतोषजनक'' और ''मध्यम'' श्रेणी के दिनों की संख्या बढ़ रही है, ''गंभीर'' और ''बहुत खराब'' श्रेणी वाले दिन घट रहे हैं। लेकिन हमें अपनी प्लानिंग इसी तरह बनानी चाहिए कि प्रतिकूल मौसम में हालात अनुकूल ही बने रहें। जिस दिशा में काम हो रहे हैं, उससे मैं सहमत हूं। लेकिन जिस स्केल पर काम होने चाहिए, उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं। वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए कार्ययोजना व्यावहारिक- दीर्घकालिक होनी चाहिए। जो कारक प्रदूषण की जड़ हैं, उन पर फोकस करना चाहिए। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिक बसें लाना एवं इनकी संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोग निजी वाहन छोड़कर इनमें सफर करें। - सुनीता नारायण, महानिदेशक, सीएसई

2014 के बाद दिल्ली के पीएम 10 में 42 और पीएम 2.5 में 46 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। गंभीर श्रेणी की वायु गुणवत्ता वाले दिनों की संख्या निरंतर घट रही है। 2008 में सर्दियों के सीजन में 36 दिन गंभीर श्रेणी की हवा रही थी जबकि 2022 में यह संख्या घटकर सिर्फ छह रह गई। दिल्ली सरकार के प्रयास रंग ला रहे हैं। दिल्ली में वायु प्रदूषण की दो श्रेणियां हैं। एक, वर्ष भर रहने वाला और दूसरा 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक। दोनों के कारण भी अलग अलग हैं। मौसमी परिस्थितियों के अलावा राजधानी में प्रदूषण की तीन मुख्य वजह हैं- धूल, वाहनों का धुआं और पराली। इन पर नियंत्रण पाने के लिए दिल्ली सरकार के स्तर पर तो निरंतर प्रयास हो रहे हैं, लेकिन एनसीआर में शामिल अन्य राज्यों में नहीं किए जा रहे हैं। जब तक जमीनी स्तर पर संयुक्त प्रयास नहीं होंगे, बहुत सकारात्मक और स्थायी परिणाम भी नहीं आ पाएंगे। -गोपाल राय, प्रदेश संयोजक, आप

दिल्ली को वायु प्रदूषण से मुक्ति दिलाना भाजपा की प्राथमिकता है। केंद्र सरकार भी इसके लिए लगातार काम कर रही है। पराली प्रबंधन पर काम चल रहा है तो ईस्टर्न वेस्टर्न पेरीफिरल एक्सप्रेस के जरिये भी स्थिति में सुधार किया गया है।केंद्र की ओर से दिल्ली को ई बसें उपलब्ध कराई जा रही हैं। यमुना का कायाकल्प और कूड़े के पहाड़ खत्म करना भी हमारी शीर्ष प्राथमिकताओं में हैं। अगर केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार का भी सहयोग मिले तो स्थिति में अधिक सुधार देखने को मिल सकता है। - डॉ अनिल गुप्ता, प्रवक्ता, प्रदेश भाजपा

दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने के लिए तात्कालिक नहीं दीर्घकालिक कार्ययोजनाओं की जरूरत है। जिस तरह कांग्रेस सरकार ने दिल्ली में सीएनजी लांच की, थर्मल पावर प्लांट बंद किए, हरित क्षेत्र को बढाया और ग्रीन दिल्ली का खिताब भी पाया, उसी तरह आप सरकार को भी सक्रिय होना चाहिए। केवल आरोप प्रत्यारोप के सहारे यह समस्या नहीं सुलझ पाएगी। कांग्रेस के पास आज भी इस समस्या के निदान का रोड मैप है। - जितेंद्र कुमार कोचर, वरिष्ठ नेता, प्रदेश कांग्रेस

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