नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। चलिए बचपन की यादों को ताजा करते हैं। चाचा चौधरी और साबू को तो पढ़ा ही होगा। हां- हां, आप यही कहना चाहते होंगे कि चाचा चौधरी का दिमाग तो कम्प्यूटर से भी तेज चलता है। बिल्कुल, और क्या खयाल है पिंकी, बिल्लू, तोषी, बजरंगी पहलवान, छक्कन, जोजी, ताऊ जी, गोबर गणेश, चम्पू, भीखू, शांतू के बारे में। ये सारे नाम पढ़कर दिमाग में कॉमिक्स की सुनहरी दुनिया जीवंत हो उठी होगी लेकिन इन पात्रों के जरिए आपके बचपन को रोमांचक बनाने वाले प्राण कुमार शर्मा असल जिंदगी में फौजी बनना चाहते थे।

संघर्षों से भरी थी प्राणों की जिंदगी

प्राण की जिंदगी संघर्षों भरी थी। बोर्ड पेंटर से अध्यापन तक में हाथ आजमाया। दिल्ली की गलियों में खूब भटके। कार्टून शौकिया बनाना शुरू किया लेकिन बाद में इसे ही जिंदगी बना ली।

आजादी के बाद परिवार आया था परिवार

प्राण कुमार शर्मा का जन्म 15 अगस्त 1938 को पाकिस्तान में हुआ था। आजादी के बाद परिवार भारत आया। प्राण ग्वालियर रहने लगे एवं बाद में स्नातक करने के बाद नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गए। प्राण की जिंदगी को उनकी पत्नी आशा प्राण ने किताब की शक्ल में दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। मेरी नजरों से प्राण किताब में आशा लिखती हैं कि स्नातक की पढ़ाई के बाद प्राण अपनी मां के साथ दिल्ली आ गए। मिंटो ब्रिज सरकारी क्वार्टर में कमरा किराये पर लिया। छोटा मोटा काम करके कुछ पैसा जमा किया। उससे पहले पहल एक राजदूत खरीदी और मां को पूरा पार्लियामेंट का चक्कर लगवाया।

और पढ़ना चाहते थे प्राण

प्राण पढ़ना चाहते थे। उन दिनों पंजाब विश्वविद्यालय से संबंद्ध दिल्ली कॉलेज में सांध्य कक्षाएं चलती थी। प्राण ने यहां से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया। उन दिनों दिल्ली में रंग-बिरंगे पोस्टर बहुत प्रसिद्ध थे। प्राण को पहाड़गंज में एक स्टूडियो में काम मिल गया। दिन भर पोस्टर बनाते, शाम में पढ़ाई करने जाते। एक दिन ख्याल आया कि चित्रकला आती है, फिर जीवन निर्वाह के लिए भटकना क्यों?

कैंसर से हुई थी मौत

इसके बाद स्कूलों में पढ़ाने के लिए कोशिश की। वहां डिप्लोमा आड़े आया तो मुंबई स्थित जे जे स्कूल आफ आर्ट से फाइन आर्ट की पढ़ाई की। शौकिया वो कार्टून पहले से बनाते थे। एक समय था जब प्राण फौज में भर्ती होना चाहते थे। सन 1960 में अखबार ‘मिलाप’ की कॉमिक पट्टी ‘दब्बू’ से करियर ने जोर पकड़ा। फिर हिंदी पत्रिका ‘लोटपोट’ में साहसी मोटू और पतलू ने पहचान दिलाई। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1969 में प्राण ने चाचा चौधरी का स्केच बनाया, जिसने उन्हें लोकप्रिय बना दिया। 5 अगस्त 2014 में प्राण की कैंसर से मौत हो गई थी। मरणोपरांत इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

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